लीमा पेरू के वैज्ञानिकों ने जाना जीरो टिलेज पोटेटो तकनीक का रूझान।
लीमा पेरू के वैज्ञानिकों ने जाना जीरो टिलेज पोटेटो तकनीक का रूझान।

पातेपुर से मोहम्मद एहतेशाम पप्पु एवं बब्लू मिश्रा की रिपोर्ट।
अंतरराष्ट्रीय आलू संस्थान, लीमा पेरू, के जीरो टिलेज पोटेटो प्रोजेक्ट के वैज्ञानिक डॉ जान क्रूजे एवम डेविड ने बिहार के वैशाली जिले के पातेपुर के निरपुर गांव के किसानों के जीरो टिलेज आलू उत्पादन के रुझान एवम भविष्य की संभावनाओं को जाना। इसी दौरान बिसा के अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक डॉ आरके जाट ने वैशाली जिले के किसानों की समस्याओं को बताते हुए कहा की खरीफ की बरसात का पानी धान की कटाई के कई दिनों तक सूखता नही है। जिससे किसान को खेत की जुताई के लिए इंतजार करना पड़ता है जिससे आलू की बुवाई में देरी हो जाती है। डॉ जाट ने बताया की किसान जीरो टिलेज आलू की विधि को अपनाकर आलू की समय से बुवाई कम लागत में कर सकते हैं एवं अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते है। इसी मौके पर अंतर्राष्ट्रीय आलू केंद्र के वैज्ञानिक डॉ एसके ककरालिया ने जीरो टिलेज प्रॉजेक्ट के बारे में अवगत करवा की इस विधि को हाल ही में बिहार के पटना, नालंदा, रोहतास, वैशाली जिलों में लगाया गया है। डॉ ककरालिया ने यह भी बताया की इस विधि से आलू उत्पादन करने से आलू की गुणवत्ता भी परम्परागत आलू की खेती की तुलना में काफी अच्छी होती है । फसल तैयार होने के बाद जीरो टिलेज तकनीक के खेतों से आलू को जमीन की सतह से सीधे एकत्रित कर बोरे में भरा जा सकता है, जबकि परम्परागत तरीके से लगाए गए आलू के खेत में आलू को उखाड़ने के लिए मशीन एवं मजदूर का सहयोग लिया जाता है जिससे काफी मात्रा में आलू खराब हो जाता है । इस विधि को अपनाने से किसान जुताई खर्च एवं मजदूरी खर्च की में 40% बचत कर सकते हैं एवम 15-20 % तक उपज में वृद्धि कर सकते है। इस मौके पर पातेपुर के प्रगतिशील किसान संजीव कुमार के साथ कई अन्य गावों के किसानों से अपने विचार रखे।
