इस बार मौसम प्रतिकूल रहने से लीची की शहद उत्पादन में हुई व्यापक ह्रास
इस बार मौसम प्रतिकूल रहने से लीची की शहद उत्पादन में हुई व्यापक ह्रास
लागत के अनुसार आमदनी नहीं होने से मधु उत्पादन से अब मुंह मोड़ने लगे किसान, महुआ का मिर्जानगर गांव मधुमक्खी पालन कर मधु उत्पादन में रहा है अग्रणी
महुआ। रेणु सिंह
मौसम की प्रतिकूलता के कारण अब शहद उत्पादन से किसान मुंह फेरने लगे हैं। इस बार तो हीटवेव के कारण लीची की मधु उत्पादन में व्यापक ह्रास हुई है। जिससे उत्पादकों में हताशा देखी जा रही है। शुक्रवार को यहां शहद उत्पादकों ने बताया कि अब मौसम उनके लाइक नहीं है। जिसके कारण वह मधुमक्खी पालन से हाथ खड़े कर रहे हैं।
महुआ के मिर्जानगर गांव पूर्व से ही मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन में अग्रणी रहा है। यहां के 80 फीसद परिवार मधुमक्खी पालन कर श दउत्पादन करते हैं। उत्पादकों ने बताया कि अब मौसम मधुमक्खी पालन के लिए साथ नहीं दे रहा है। गांव के खेतों में लगी फसलों पर कीटनाशी दवाओं का अधिक प्रयोग हो रहा है। इसके कारण मधुमक्खी खेतों में पौधों से पराग नहीं ले पाते हैं। इसके कारण वे मधुमक्खी के बक्सों को लेकर दूरदराज जंगली क्षेत्र में ले जाकर उसे रखते हैं और शहद उत्पादन करते हैं। यहां मिर्जानगर के शहद उत्पादक किसान गजेंद्र सिंह कुशवाहा, मुन्ना सिंह, बबलू सिंह, अमरजीत सिंह, सत्येंद्र सिंह, चंद्र मोहन सिंह, राजकुमार सिंह कुशवाहा आदि ने बताया कि इस बार लीची से शहद का उत्पादन नहीं हो पाया। ऐन वक्त पर आंधी पानी हो जाने के कारण लीची के शहर उत्पादन में काफी कमी आई है। किसानों ने बताया कि यहां सबसे अच्छा लीची की शहद होती है और इसकी मांग विभिन्न प्रदेशों में अधिक है। इसके अलावा तोड़ी, धनिया, खेसारी, करंज, सूरजमुखी आदि के फूलों से मधुमक्खियां परागण कर उससे शहद तैयार करती है।
इटालियन मधुमक्खी का पालन कर शहद उत्पादन में लगे हैं किसान:
मिर्जानगर गांव में किसान इटालियन मधुमक्खी का पालन कर उससे शहद उत्पादन कर रहे हैं। किसान गजेंद्र सिंह कुशवाहा बताते हैं कि इटालियन मधुमक्खी में शहद उत्पादन की क्षमता अधिक होती है। उन्होंने यह भी बताया कि इस समय यह प्रति बक्सा 50 किलो वजन देती है। हालांकि पूर्व में 75 किलो प्रति बक्सा शहद का उत्पादन होता थ। इधर मौसम की प्रतिकूलता के कारण मधुमक्खियां ठीक से परागण की क्रिया नहीं कर पाती। जिसके कारण उत्पादन में कमी आई है। उन्होंने बताया कि वे मधुमक्खी के 300 बख्शा रखे थे जो घटकर 150 पर पहुंच गई है।
किसानों को नहीं मिलता उत्पादन का सही मूल्य:
महुआ के मिर्जानगर गांव में मधु उत्पादकों की संख्या अधिक रहने और उनमें हौसले बुलंद होने को देखते हुए यहां मधु शोध संस्थान भी खोला गया है। यहां पर किसानों के उत्पादन को खरीद कर उसे ब्रांड रूप दिया जाता है। यहां से विभिन्न प्रदेशों में लीची ब्रांड मधु भेजी जाती है। लीची फ्लेवर शहद का तो जवाब नहीं और इसके स्वाद के दूसरे प्रदेश के लोग कायल हैं। हालांकि यहां के साथ उत्पाद को तो मलाल है कि उन्हें उत्पादन का सही मूल्य नहीं मिल पाता। जिसके कारण वह उत्पाद को औने पौने भाव में बेचने को मजबूर होते हैं। मालूम होती जिले में सबसे अधिक मधु उत्पादक महुआ के मिर्जानगर में है। इसके बाद यहां के परसोनिया, ओस्ती, चक्काजीनिजाम, कुशहर, कादिलपुर, उधर गोरौल, चेहराकला, जंदाहा, महनार, सहदेई आदि में भी कुछ किसान शहद उत्पादन से जुड़े हैं। इस समय मक्का, तिल, मूंग से मधुमक्खियां परागण कर रही है।
