बेटी कभी माथे का बोझ नहीं, बल्कि घर की लक्ष्मी होती है। बेटी को जन्म लेने पर एक पिता को गम इसलिए नहीं होता कि वह बोझ बन कर आई है। बल्कि अपने दर्द को उसी समय अंदर ही अंदर डुबो लेता है कि वह उसकी नहीं पराई बनकर आई है। जब तुम जन्म ली थी तो घर में बधाइयां और सोहर गीत गाए गए थे। हर लोगों ने एक ही बात कही थी घर में लक्ष्मी आई है। तुमने पिता के हर सुख दुख में साथ दिया और हमें गर्व है कि कभी भी तुमको कमी का एहसास नहीं हुआ। पठन-पाठन से लेकर बेटी की फर्ज अदा करने में कभी भी तुमने कोर कसर नहीं छोड़ी है। तुम्हें पता है जब तुम छोटी थी तो मैं तुझे साइकिल के आगे गमछा बांधकरप उस पर बिठाकर हर जगह ले जाया करता था। तुम्हारी बचपन, तुम्हारी शरारतें, तुम्हारी भोलेपन, तुम्हारी विश्वास हमें आत्म बल दिया है। मालूम है, हमें तो पता भी नहीं चला कि तुम बड़ी हो गई हो। हम तो अपनी बेटी को वही बचपन को जानते हैं जो हम कहीं जाते थे तो हमरे लिए रोया करती थी और पूरा घर सिर पर उठा लेती थी। फिर मैं लौटकर आता था और तुझे लेकर जाता था। हमें तो गांव समाज, सगे-संबंधी ने बताया कि बेटी बड़ी हो गई है। अब उसे घर वर देखकर शादी करनी चाहिए। उस समय जो मेरे कलेजे पर धक्का लगा था वह मैं ही जानता हूं। इसलिए कि क्या मेरी बिटिया बड़ी हो गई है और वह हमें छोड़ कर चली जाएगी। मालूम है जब तुझे विदा किया था तो मेरे कलेजे कितने दहले थे। मैं तुम्हारी गाड़ी के पीछे पीछे कुछ दूर तक गया और तब तक तुम्हारी और देखता रहा जब तक गाड़ी मेरी आंख से ओझल नहीं हो गई। उसके बाद मैं किसी तरह दरवाजे पर आया और हताश हो गया। उस समय मैंने मुरझाई दिल से कहा कि काश मुझे एक बेटी और होती। इसलिए कि जो मैंने तुम्हें प्यार, स्नेह, ममता, दुलार लूटाने में कमी किया हूं वह दूसरे में पूरी कर लूं। फिर मैंने अपने को सहूरट किया और जिन लोगों ने तुम्हारी शादी में अपनी महती भूमिका निभाई थी, उन्हें दिल से घन्यवाद दिया। यहां तक की भाड़े पर आए टेंट वाले, समियाना वाले, पंडाल वाले, हलवाई, बाजा वाले, खाना परोस कर खिलाने वाले, शादी में शुभ कलश और मिट्टी के हाथी वगैरह बना कर देने वाले कुम्हार आदि को मैंने प्रणाम किया और कहा की मेरी बेटी की शादी को सफलतापूर्वक निर्वहन मेंआप सबो ने जो साथ दिया है, उसका मैं सदैव ऋणी रहूंगा। सबसे ज्यादा मैं अपने मित्रों का शुक्रगुजार और ऋणी हूं जिन्होंने अपनी काम को छोड़कर बिटिया की शादी में भरपूर मदद की है। जहां मैं पिछड़ता था वह आगे होते थे। मैं तो आज भी दिल से कहता हूं कि मेरी बेटी की शादी में हमसे कहीं ज्यादा हमारे मित्रों ने सफल भूमिका निभाई है। आज मैं यह भी कहता हूं की बेटी पराई नहीं बल्कि उसके जीवन साथी घर में बेटा बनकर आता है। अंत में एक बात और, जब मैं तुम्हारे यहां पहली बार गया था तो कुछ ग्रामीण धारणाओं को रखते हुए याद दिलाई थी कि बेटी की शादी और उसकी दान करने के बाद वहां खाते नहीं। मैंने एक जवाब दिया था मैं बेटी की कहां बेटा के के घर आया हूं। यह कोई कहानी नहीं बल्कि सच्चाई और मेरे दिल के उद्गार हैं। तुम्हारे पापा नवनीत कुमार, हिंदुस्तान मीडिया, महुआ 😔😔😔😔😔 22.11.2022