February 7, 2026

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प्रति वर्ष आषाढ़ की पूर्णिमा के दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है

आषाढ़ की पूर्णिमा शुक्ल पक्ष आषाढ़ मास की एकादशी तिथि से प्रारंभ होकर कार्तिक माह के जेठाण तक चतुर्मास होते हैं इस चारों माह में शुभ काम नहीं किए जाते यथा शादी विवाह इस बीच इन चारों महीने का संचालन प्रभु के प्रतिनिधि बनकर गुरु करते हैं इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के नाम से संबोधित किया जाता है। मातृ उद्वोधन आध्यातिमक केंद्र संचालक- ठाकुर अरूण कुमार सिंह

रिपोर्ट:- सनोवर खान/रोहित कुमार

कंकड़बाग पटना:- प्रति वर्ष आषाढ़ की पूर्णिमा के दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा इस माह 3 जुलाई, सोमवार को आषाढ़ माह की पूर्णिमा के दिन भारत में मनाई जाएगी। गुरु का स्थान मानव जीवन में सर्व प्रथम होता है। गुरु को विशेष महत्व देने के लिए गुरु पूर्णिमा को गुरु पूजन किया जाता है। गुरु मंत्र प्राप्त करने के लिए भी इस दिन को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन विशेषरूप से अपने गुरू के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है क्योंकि गुरू के ज्ञान के प्रकाश से मानव जीवन का अंधकार दूर होता है। सच्चे आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से ही पूर्ण ब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति संभव है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हम अपने जीवन में गुरु के महत्व को जानेंगे। साथ ही सच्चे गुरु के बारे में भी जानेंगे जिनकी शरण में जाने से हमारा पूर्ण मोक्ष संभव है। जैसे सेब को यदि काटकर देखें तो उसमें से अक्सर तीन बीज निकलते हैं और एक बीज से एक पेड़, एक पेड़ से अनेक सेब, अनेक सेबों में फिर तीन-तीन बीज हर बीज से फिर एक-एक पेड़ और यह अनवरत क्रम चलता ही जाता है। ठीक इसी तरह गुरु की कृपा हमें प्राप्त होती रहती है। बस हमें उसकी भक्ति का एक बीज अपने मन में लगा लेने की जरुरत है। 01. गुरु एक तेज है, जिनके आते ही सारे संशय के अंधकार खत्म हो जाते हैं।
02. गुरु वो मृदंग है, जिसके बजते ही अनाहद नाद सुनना प्रारम्भ हो जाता है।
03. गुरु वो ज्ञान है, जिसके मिलते ही भय समाप्त हो जाता है।
04. गुरु वो दीक्षा है, जो सही मायने में मिलती है तो भव सागर पार हो जाते हैं।
05. गुरु वो नदी है, जो निरन्तर हमारे प्राणों से बहती है।
06 गुरु वह सत् चित् आनन्द है, जो हमें हमारी पहचान देता है।
07. गुरु वो बांसुरी है, जिसके बजते ही मन और शरीर आनन्द अनुभव करता है।
08. गुरु वो अमृत है, जिसे पीकर कोई कभी प्यासा नहीं रहता ।
09. गुरु वो कृपा है, जो सिर्फ कुछ सद् शिष्यों को विशेष रूप में मिलती है और कुछ पाकर भी समझ नहीं पाते हैं।
10. गुरु वो खजाना है, जो अनमोल है।
11. गुरु वो प्रसाद है, जिसके भाग्य में हो उसे कभी कुछ भी मांगने की जरूरत नहीं पड़ती।
यदि गुरु धारण नहीं किया है तो आप कितना भी विवेक से कार्य करें सब निष्फल है। शास्त्रों में वर्णन है कि गुरु के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है और इस बात को सन्तों ने भी अपनी वाणियों में दोहराया है। सभी कर्मों का फल अवश्य मिलता है। किन्तु बिना गुरु किये दान पुण्य एवं अन्य धार्मिक कार्यों का कोई फल नहीं मिलता। सभी चीजें या वस्तुएं समय आने पर ऋण की भाँति वापस लौटा दी जाती हैं। किन्तु पूर्ण गुरु यानी तत्वदर्शी संत से नामदीक्षा लेने के बाद मिलने वाले लाभ एवं फल अद्वितीय होते हैं। लोक एवं परलोक दोनों के लाभ व्यक्ति प्राप्त करता है।

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