क्या वाकई मुसलमानों में कोई भेदभाव नहीं? एक कड़वी सच्चाई
क्या वाकई मुसलमानों में कोई भेदभाव नहीं? एक कड़वी सच्चाई
विश्लेषणात्मक रिपोर्ट: नसीम रब्बानी،बिहार
“एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद-ओ-अयाज” — सुनने में ये जुमला बहुत खूबसूरत लगता है। मगर क्या जमीनी हकीकत भी ऐसी ही है? सच ये है कि दावों के उलट मुस्लिम समाज में आज भी ऊंच-नीच, जात-पात और सामाजिक भेदभाव की गहरी जड़ें मौजूद हैं।
1. नस्ल का झूठा घमंड:
खुद को “अशराफ” कहने वाले सैयद, शेख, मुगल और पठान तबकों में आज भी अपने नस्ल को दूसरों से बेहतर समझने का चलन पाया जाता है। अरब या फारस से नाता जोड़कर स्थानीय मुसलमानों को कमतर समझना आम है।
2. शादी-ब्याह में दोहरा मापदंड:
बराबरी का असली इम्तिहान रिश्ते-नाते हैं। अगर सब बराबर हैं तो सैयद या शेख खानदान अंसारी, मंसूरी या कुरैशी में रिश्ता करने से क्यों कतराते हैं? आज भी शादियां बिरादरी देखकर तय होती हैं।
3. पहचान का बोझ:
मजहब बदलने से पेशेवर पहचान नहीं बदली। जुलाहा “अंसारी”, लोहार “सैफी” और कसाई “कुरैशी” तो बन गया, मगर समाज में आज भी “अजलाफ” या पिछड़ा ही समझा जाता है।
4. दलित मुसलमानों से नाइंसाफी:
दलित पृष्ठभूमि से आकर मुसलमान बनने वालों की हालत सबसे खराब है। जो पहले सफाई का काम करते थे वो आज भी वही कर रहे हैं। हलालखोर या लालबेगी जैसे नामों से पहचान बाकी है।
5. रिपोर्टें क्या कहती हैं:
सच्चर कमेटी समेत कई रिपोर्टों ने साबित किया है कि मुस्लिम समाज के पिछड़े तबकों को शिक्षा, रोजगार और नुमाइंदगी में बराबर मौके नहीं मिले।
नतीजा:
बराबरी का नारा लगाना आसान है, अमल करना मुश्किल। जरूरत इस बात की है कि हम इन कड़वी सच्चाइयों को कबूल कर सुधार की तरफ गंभीर कदम उठाएं।
✍️ लेखक: इरफान जामियावाला
राष्ट्रीय महासचिव: ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज
