April 17, 2026

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मातृ उद्बोधन आध्यत्मिक केन्द्र के संचालक श्री ठाकुर अरुण कुमार सिंह एवं संयुक्त सचिव श्री मुरारी शर्मा ने कहा?

मातृ उद्बोधन आध्यत्मिक केन्द्र के संचालक श्री ठाकुर अरुण कुमार सिंह एवं संयुक्त सचिव श्री मुरारी शर्मा ने कहा? मौनी अमावस्या के महत्व के बारे में शिवपुराण में उल्लेख किया गया है. कहा जाता है इस दिन दान देने से ग्रह दोष खत्म हो जाते हैं, साथ ही मौन व्रत रखने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है.

रिपोर्ट:- सनोवर खान/रोहित कुमार

मौनी अमावस्या यानी कि मौन रहकर ईश्वर की साधना करने का अवसर। इस तिथि को मौन एवं संयम की साधना, स्वर्ग एवं मोक्ष देने वाली मानी गई है।शास्त्रों में मौनी अमावस्या पर मौन रखने का विधान बताया गया है। यदि किसी व्यक्ति के लिए मौन रखना संभव नहीं हो तो वह अपने विचारों को शुद्ध रखें मन में किसी तरह की कुटिलता नहीं आने दें। आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी वाणी का शुद्ध और सरल होना अति आवश्यक है। मौनी अमावस्या का धर्म शास्त्रों में बहुत ही खास महत्व माना गया है। इस दिन व्रत रखकर भगवान की पूजा पाठ में मन लगाना चाहिए। संभव हो सके तो इस दिन गंगा में स्नान जरूर करना चाहिए। ऐसा करने से सभी पाप दूर होते हैं और विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
मौनी अमावस्या के महत्व को इस तरह भी परिभाषित कर सकते हैं कि ध्वनि सतह पर होती है और मौन भीतर होता है, अंतर में। इसलिए सभी प्रकार की ध्वनियों से परे जाकर अंतर यानी शून्य में उतरने की क्रिया मौन कहलाती है। तात्पर्य यह कि यदि सृष्टि का अंश यानी मनुष्य सृष्टि के स्रोत यानी शून्य में रूपांतरित होने की कोशिश करे तब मौन घटित होता है। यही कारण है कि जब कोई साधक मौन की साधना करता है तो वह अपने आसपास ही नहीं, बल्कि सृष्टि में मौजूद तमाम ध्वनियों से परे पहुंचने की कोशिश करता है, क्योंकि ध्वनियों से परे पहुंचे बिना मौन हुआ ही नहीं जा सकता।अध्यात्म जगत में मौन का सदा से ही अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है, क्योंकि अध्यात्म के शिखर को छूने में इस मौन का प्रमुख योगदान होता है। इसलिए हमारी संस्कृति में मौन को किसी भी व्यक्ति के लिए आध्यात्मिक शिखर तक पहुंचने का एक सटीक एवं शाश्वत माध्यम माना गया है। यही कारण है कि हमारे तमाम ऋषि-मुनियों और साधु-संतों ने मौन को अपनी आध्यात्मिक साधना का एक महत्वपूर्ण अंग बनाया, इसे प्रतिष्ठित किया।मौनी अमावस्या के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु एवं भगवान शिव की पूजा का विधान है। इस दिन सूर्यदेव को अर्घ्य देने से भक्त के जीवन में तेज, ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार होता है, जबकि गंगा स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ करने के समान फल मिलता है। वहीं पितरों का तर्पण करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। वैसे भी हमारी शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार जिह्वा एवं होंठों से किये जाने वाले मंत्रोच्चारण की अपेक्षा मनका मनका फेरने यानी मौन रहकर मंत्र-जाप करने का पुण्य कई गुना अधिक होता है।यदि पूरा दिन मौन-व्रत रखना संभव न हो तो स्नान-दान से पूर्व सवा घंटे का मौन-व्रत रखना चाहिए। यदि यह भी संभव न हो तो कम-से-कम कटु शब्द बोलने से बचना चाहिए और जिनके लिए मौनी अमावस्या का व्रत रखना संभव ही न हो उन्हें इस दिन मीठा भोजन करना चाहिए। इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु का पूजन करना बेहद शुभ होता है। पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए इस दिन को बेहद खास माना गया है।

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