April 19, 2026

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हाजीपुर में 1971 भारत-पाक युद्ध के जिंदा भारतीय युद्ध बंदियों को दी गई श्रद्धांजलि ।

हाजीपुर में 1971 भारत-पाक युद्ध के जिंदा भारतीय युद्ध बंदियों को दी गई श्रद्धांजलि

हाजीपुर (वैशाली)अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस को अंतरराष्ट्रीय धिक्कार दिवस घोषित करते हुए स्वामी विवेकानंद सामाजिक शोध संस्थान वैशाली बिहार ने ” सन 1971 भारत-पाक युद्ध में 54 जिंदा भारतीय युद्ध बंदियो को श्रद्धांजलि दिया। श्रद्धांजलि सभा प्रोसेसर डॉ. अजीत कुमार सचिव ,स्वामी विवेकानंद सामाजिक शोध संस्थान वैशाली बिहार के नेतृत्व में हाजीपुर नगर के संस्कृत कॉलेज में आयोजित की गई। डॉ अजीत कुमार ने बताया कि जिंदा भारतीय युद्ध बंदियों को श्रद्धांजलि देने के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जेनेवा स्वीटजरलैंड एवं अपने मुल्क के करणधरो एवं भारत के राजनेताओं के मुंह पर जोरदार तमाचा है। प्रोफेसर डॉ. अजीत कुमार ने श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं भारत के सभी राजनेताओं से प्रश्न किया है कि कहां है ? सन 1971 के भारत -पाक युद्ध के 54 भारतीय बंदी ? 53 वर्षों से आज भी ये पाकिस्तान के जेलों में बंद है या मार दिए गए। भारतीय युद्ध बंदिया के बारे में किसी को कुछ पता नहीं। युद्ध के मोर्चे से कहां गए ,वे भारत माता के सपूत क्या उन्हें जमीन निकल गई या आसमान अपने आगोश में समा लिया । यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है? पाकिस्तान के लखपत कोर्ट जेल में बंद भारतीय युद्धबंदी को रिहाई के लिए डॉ अजीत कुमार बताते हैं कि वे लगभग 30 वर्षों से भारतीय युद्ध बंधिया के रिहाई के लिए लगातार संघर्षरत है। धरना प्रदर्शन अनशन से लेकर न्यायालय तक सेज्ञवे गुहार लगाई। लेकिन अभी तक युद्धबंदियों की रिहाई के दिशा में सफलता नहीं मिली है।
1971 युद्ध के जिंदा शहीदों को श्रद्धांजलि डॉक्टर प्रोफेसर डॉक्टर अजीत कुमार उत्पलकांत सौरभ कुमार भारद्वाज उदय कुमार कुमुद कुमार आयुष कुमार गौतम कुमार नीतीश कुमार सिंह उर्फ गोलू कुमार एवं रितिक कुमार यादव ने सजन श्रद्धांजलि दी भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति है द्रौपदी मुर्मू और भारत के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी से मांग किया कि पाकिस्तान के लखपत कोर्ट जेल में बंद 54 भारतीय युद्ध बंधु को अभिलंब रहा कराई जाए जिसकी सूची कई बार हम लोगों ने धरना प्रदर्शन के माध्यम से सरकार को मुखिया कराया भी लेकिन पता नहीं अभी तक इस दिशा में हर प्रकार खामोश है क्यों।
मेरे बगल के वार्ड में 50 -55 के लगभग युद्ध बंदी रखे गए हैं।पूरी रात इनके कराहने को मैं कभी भूल नहीं सकता।
यह उस पत्र के अंश हैं, जिसे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने अपने वकील और जेल अधीक्षक को लिखा था‌ इसकी चर्चा “भुट्टो ट्रायल एंड एग्जीक्यूशन” पुस्तक में है ।इसकी लेखिका बीबीसी की संवाददाता विक्टोरिया एस्कॉर्ट फील्ड है ‌तब भुट्टो लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद थे। इन कैदियों के रोने, विलखने व कराहने से भुट्टो सो नहीं पा रहे थे। क्योंकि जेल में युद्ध बंदीयों को अमानवीय वरबर यातना दी जा रही थी ।जब भुट्टो के वकील ने जेल अधिकारियों से पूछा ,तो पता चला कि ये 1971 के भारतीय युद्ध वंदी है। इन्हें अब कुछ भी याद नहीं है।
भारत ने इसी 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के 94000 युद्ध बंदियों को रिहा कर दिया। लेकिन भारतीय युद्ध बडियो की रिहाई कि किसी को फिक्र नहीं था। युद्ध बंधिया में थल सेवा की सिपाही से लेकर मेजर रैंक तक के अधिकारी शामिल है इसी तरह वायु सेवा के युद्ध बंधिया में फ्लाइंग ऑफिसर सेविंग कमांडर तक है।
युद्ध बंदियों की रिहाई की दिशा में सरकार और राजनेता उदासीन है। यह कितनी शर्म की बात है। तपते रेगिस्तान या खून जवाब देने वाली ठंड में न केवल ड्यूटी पर मुस्तैद रहते, बल्कि जान की बाजी लगा देने वाली सैनिकों के साथ ऐसा क्या हो रहा है। कारण स्पष्ट है पांच सितारा होटलों के वातानुकूलित कमरों वार्ता बैठकर करने से इन जुड़वा बंधिया के साथ रिहाई आधार में ही लटका रहेगा।
पाकिस्तान के जिलों में कैद युद्ध बंधिया की एक ही तमन्ना है की वे अपने वतन लौट आए और वतन के मिट्टी में अंतिम सांस ले। डॉ अजीत कुमार कहा कि हम अंतिम सांसे तक इन युद्ध बंदियों की रिहाई कि लड़ाई लड़ेंगे । जो भारतीय युद्ध बंदी ‘लौट के घर ना आ ‘ पाए।

रिपोर्ट सुधीर मालाकार, महुआ वैशाली 

 

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