May 15, 2026

NR INDIA NEWS

News for all

मौत को मात देकर बने समाज के रक्षक: सीतामढ़ी के ‘टीबी चैंपियन’ मोहम्मद गुलफाम की दास्तां

मौत को मात देकर बने समाज के रक्षक: सीतामढ़ी के ‘टीबी चैंपियन’ मोहम्मद गुलफाम की दास्तां

​सीतामढ़ी।
​बिहार के सीतामढ़ी जिले के बाजपट्टी प्रखंड में एक ऐसा शख्स रहता है जिसने न केवल अपनी सांसों पर आए संकट को टाला, बल्कि अब वह हजारों लोगों की सांसों की रखवाली कर रहा है। यह कहानी है मोहम्मद गुलफाम की, जो कभी खुद गंभीर बीमारी की चपेट में थे और आज पूरे समाज के लिए एक ढाल बनकर खड़े हैं।

​वह साल और वह दहशत:
वक्त था साल दो हजार उन्नीस का, जब गुलफाम की जिंदगी में अचानक अंधेरा छा गया। शरीर टूटने लगा और जांच में सामने आया कि उन्हें खतरनाक किस्म की टीबी यानी ‘शॉर्टर एमडीआर’ ने जकड़ लिया है। डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि दो साल तक कड़ी दवाइयां खानी पड़ेंगी। किसी भी साधारण इंसान के लिए यह खबर किसी पहाड़ टूटने जैसी थी, लेकिन गुलफाम की रगों में हार न मानने वाला जुनून दौड़ रहा था।

​हौसलों से सिमट गया वक्त:
इलाज शुरू हुआ और दवाओं का भारी असर भी शरीर पर दिखने लगा। अक्सर लोग इस लंबी प्रक्रिया में हिम्मत हार जाते हैं, पर गुलफाम का अनुशासन इतना पक्का था कि जिस बीमारी को हराने के लिए दो साल का वक्त तय था, उसे उन्होंने मात्र नौ महीनों में धूल चटा दी। उनकी यह जादुई रिकवरी केवल एक चिकित्सा चमत्कार नहीं थी, बल्कि उनकी अदम्य इच्छाशक्ति की जीत थी।

​बीमारी से जंग, अब समाज के संग:
स्वस्थ होने के बाद गुलफाम ने घर की चारदीवारी में बैठकर चैन की सांस नहीं ली। उन्होंने फैसला किया कि जिस दर्द से वह गुजरे हैं, उससे किसी और को टूटने नहीं देंगे। साल दो हजार इक्कीस से दो हजार चौबीस के बीच उन्होंने ‘रिच-यूनाइट टू एक्ट’ संस्था के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। एक ‘टीबी चैंपियन’ के तौर पर उन्होंने गाँव-गाँव, पंचायत-पंचायत और घर-घर जाकर इस बीमारी के खिलाफ अलख जगाई।

​कलंक को मिटाने का अभियान:
गुलफाम का सबसे बड़ा संघर्ष उस सोच से था जो टीबी के मरीजों को हिकारत की नजर से देखती है। उन्होंने समाज में फैली भ्रांतियों को खत्म किया और लोगों को समझाया कि टीबी कोई कलंक नहीं, बल्कि एक सामान्य बीमारी है जिसका इलाज संभव है। उनके तीन साल के अनुभव ने कई टूटे हुए परिवारों को फिर से जोड़ा है और मरीजों को विश्वास दिलाया है कि इलाज अधूरा छोड़ना खुद को खतरे में डालना है।

​अश्वसन और नई उम्मीद:
आज जब मोहम्मद गुलफाम सीतामढ़ी की गलियों से गुजरते हैं, तो लोग उन्हें केवल एक स्वस्थ व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक रक्षक के रूप में देखते हैं। उन्होंने पूरे समाज को यह आश्वासन दिया है कि अगर मन में विश्वास और सही चिकित्सा का साथ हो, तो टीबी मुक्त भारत का सपना सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि हकीकत बन सकता है। गुलफाम की यह यात्रा हमें सिखाती है कि हमारे घाव ही अक्सर हमारी सबसे बड़ी शक्ति बन जाते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright © All rights reserved. | Newsphere by AF themes.