April 21, 2026

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राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर महाराष्ट्र की सियासत तक – चौधरी अफज़ल नदीम

राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर महाराष्ट्र की सियासत तक

चौधरी अफज़ल नदीम

दिल्ली-देश के सियासी गलियारों में अगले साल होने वाले 15वें राष्ट्रपति चुनाव की चर्चा जोरों पर है। गौरतलबनई है कि अगले साल 2022 में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद राष्ट्रपति चुनाव होने हैं, क्योंकि 24 जुलाई 2022 को रामनाथ कोविंद का कार्यकाल पूरा हो रहा है। ऐसे में देश में एक नए राष्ट्रपति के उम्मीदवार की तलाश मद्देनजर सियासी सरगर्मियां बढ़ गई हैं। हालांकि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार की दौड़ में अभी तक एक ही नाम सामने आया है और वह नाम है एनसीपी प्रमुख शरद पवार का। वैसे तो कुछ जानकार यह भी कह रहे हैं कि उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू को भी राष्ट्रपति बनाया जा सकता है, क्योंकि अगला राष्ट्रपति एनडीए से ही होगा।

कुछ दिन पहले मायावती का नाम भी राष्ट्रपति पद को लेकर चर्चा में रहा। राजनीतिक जानकारों ने कहा कि मायावती एक दलित चेहरा हैं और उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरी दुनिया में उनकी अपनी एक अलग पहचान है, साथ ही इन दिनों उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी बसपा भाजपा की बी टीम बनी हुई है। लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में अब फिर नया मोड़ आ गया है। यह मोड़ हाल ही में नई दिल्ली में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार और प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात के बाद आया है। इस मुलाकात को भले ही एनसीपी सामान्य सामान्य शिष्टाचार बता रही हो, लेकिन राजनीतिक जानकारों ने इस मुलाकात के अपने-अपने हिसाब से मायने निकालने और कयास लगाने शुरू कर दिए हैं।

जबकि विपक्ष के कुछ नेताओं ने इस मुलाकात पर सवाल भी उठाये हैं। क्योंकि एक दिन पहले ही केंद्रीय मंत्री पीय़ूष गोयल का शरद पवार के घर जाकर मिलना और उसी दिन शरद पवार का केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मिलना और उसके बाद शरद पवार का प्रधानमंत्री मोदी से मिलना, सियासी हलचल पैदा करने वाला है।

दरअसल भाजपा जानती है कि विपक्ष की एक मजबूत कड़ी शरद पवार हैं, अगर उन्हें तोड़ लिया जाए, तो विपक्ष और कमजोर होगा। पिछले दिनों लगातार हुई इन मुलाकातों का मतलब महाराष्ट्र की शिव सेना, एनसीपी और कांग्रेस की सरकार से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, पवार ने इन अटकलों का खंडन करते हुए कहा कि सत्तारूढ़ भाजपा के पास सांसदों की बड़ी संख्या है और नतीजा वह जानते हैं।

दरअसल मोदी से लेकर ममता बनर्जी तक के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की मुलाकात पिछले दिनों राहुल और सोनिया गांधी के साथ हुई थी। इस मुलाकात के बाद से इस प्रकार की अटकलें आम हो गई थीं कि प्रशांत किशोर तमाम विपक्षी दलों को एक साथ एक मंच पर लाकर भाजपा के खिलाफ एक सियासी मोर्चे की शुरुआत कर रहे हैं। प्रशांत किशोर की राहुल-सोनिया के साथ इस मुलाकात आगामी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर बातचीत की गई है।

सबसे अहम बात जो सामने आई है वह है उम्मीदवार के तौर पर विपक्षी दलों की पसंद के रूप में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार का नाम। दरअसल, माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर समूचे विपक्ष को साधने में लगे हैं। कोशिश है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रमुख शरद पवार को अगले राष्ट्रपति के प्रत्याशी के तौर पर विपक्ष का उम्मीदवार बानने के लिए प्रयासरत हैं। इसी बीच प्रशांत किशोर का लगातार शरद पवार से मुलाकातों के दौर से कयास लगाए जा रहे हैं कि तमाम विपक्षी दल सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ नए सियासी समीकरण के मद्देनजर तीसरे मोर्चे की तैयारी है।

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की राहुल और प्रियंका गांधी के साथ हुई बैठक को विपक्ष के बीच जमी बर्फ को पिघलाने वाली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है इस बैठक में कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी भी वर्चुअली शामिल हुई थीं। प्रधानमंत्री से शरद पवार की इस मुलाकात को लेकर लुटियंस जोन के सियासी गलियारों में चर्चा है कि प्रशांत किशोर के कुछ दिन पहले शरद पवार से मिलना और भाजपा की मोदी सरकार के खिलाफ तमाम विपक्षी दलों को एक छतरी के नीचे लाने के प्रशांत किशोर के प्रयास को देखते हुए।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रशांत किशोर के ममता बनर्जी, नीतीश कुमार और कांग्रेस नेतृत्व के साथ कहीं न कहीं बेहतर संबंध रहे हैं और वह इस बात को बखूबी समझते हैं कि इन सब को किस प्रकार से एक मंच पर लाने का प्रयास किया जा सकता है। उसी रणनीति के तहत प्रशांत किशोर लगातार प्रयास कर रहे हैं। इसके अलावा तो दूसरी चर्चा है उसके मुताबिक सियासी जानकार कहते हैं कि महाराष्ट्र में कही नए राजनीतिक समीकरण के तहत भाजपा-एनसीपी साथ तो नहीं आ रहे हैं? क्योंकि भारतीय जनता पार्टी लगातार प्रयासरत है कि वह किस प्रकार से महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना की सरकार बनाए। जाहिर है कि शुरूआत में भाजपा-शिवसेना की ही सरकार बनी थी।

लेकिन किन्हीं परिस्थितियों के कारण शिवसेना ने भाजपा से अपनी राहें जुदा कर ली थीं। जबकि कई दशकों से भाजपा और शिवसेना का साथ रहा है और दोनों को एक मजबूत और पारंपरिक गठबंधन के तौर पर देखा जाता है। लेकिन सियासी खटास के मद्देनजर जिस प्रकार से शिवसेना ने अपनी धुर विरोधी कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई है। उससे कहीं न कहीं शिवसेना भी उसमें असहज महसूस कर रही है। और वह भी अंदर ही अंदर चाहती है कि उसका गठबंधन भाजपा के साथ हो।

जाहिर है कि महाराष्ट्र में शिवसेना-कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन की सरकार में पिछले कुछ दिनों से महाविकास अघाड़ी में सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है, तीनों दलों के बीच किसी न किसी मुद्दे पर उठापटक चलती रहती है। वैसे तो राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी दोबारा राष्ट्रपति बनने का मौका भाजपा की अगुवाई में बनी एनडीए सरकार दे सकती थी, लेकिन उसके ऐसा करने के कोई संकेत फिलहाल तो दिखाई नहीं दे रहे हैं।

संविधान में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि कोई भी व्यक्ति दो बार राष्ट्रपति नहीं बन सकता, लेकिन भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बाद से पहले ही कार्यकाल के बाद हर राष्ट्रपति की सेवानिवृति की एक परंपरा सी बन गयी है। बहरहाल फिलहाल एनसीपी ने महाराष्ट्र से दिल्ली तक सभी तरह की कयासबाज़ी पर लगाम लगाने की कोशिश तो की है, लेकिन क्या वाकई जैसा एनसीपी कह रही है, सब कुछ वैसा ही है या फिर कोई और राजनीतिक समीकरण बन रहा है? इसके लिए कुछ दिन इंतज़ार और संसद में चल रहे हंगामे को बारीकी से देखना पड़ेगा।

(लेखक ‘भारतीय न्यूज़ एजेंसी’ के मैनेजिंग डायरेक्टर चौधरी अफज़ल नदीम )

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