आचार्य साथी आज भी प्रसांगिक हैं : डॉ. ध्रुव कुमार
आचार्य साथी आज भी प्रसांगिक हैं : डॉ. ध्रुव कुमार
शिक्षा, साहित्य औऱ छात्र ही डॉ. साथी की आत्म – पूँजी थी : डॉ. किरण सिन्हा
एकीकृत संस्कृति के पोषक थे आचार्य साथी : अनिल रश्मि
सनोवर खान/नसीम रब्बानी
पटना सिटी। जिन्हें मेरे साथ मरना हो , वो चलें …. ये आह्वान
जब छात्रों से डा. साथी ने किया तो सैंकड़ो युवा विद्यार्थी माथे पर कफ़न बांध उनके साथ चल दिये… बात उन दिनों की है जब लोहानीपुर पुर में अज्ञात बीमारी से आठ दस लोगों की मौत हो गई थी , कोई नहीं जा रहा था, तब ये वहां गमैक्सिन पाउडर हाँथ में लिए चले गए । लोगों को साफ़ सुथरा रहने का संदेश दिया। ख़ुद छात्रों के साथ मिलकर सफ़ाई की।उसके बाद सुशील मोदी जी पहुंचे थे।
जब पटना विश्वविद्यालय में एन. एस. एस. के अधिकारी थे तब
उन्होंने प्रदेश को दिखा दिया था कि कार्य संस्कृति कैसे विकसित होती है और बिना आर्थिक संसाधन के प्रदेश के विकास में अहम भूमिका निभाई जा सकती है। छात्रों के साथ मिलकर इतना आधिक्य कार्य किया कि उनको पद्मश्री सम्मान के लिए नामित किया गया था …. लेकिन…. ।
वो गाँधी , विनोबा के विचारधारा के थे। निष्कपट कार्यसंस्कृति की वजह से उन्हें पटना का गांधी भी कहा जाता था कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, मानवीय मूल्यों के प्रति सजगता, संस्कृति-प्रहरी की बजह से आचार्य साथी आज भी
प्रसांगिक हैं। ये बातें आज जंगली प्रसाद लेन स्थित स्वरांजलि सभागार में डॉ. सच्चिदानंद सिंह साथी जी की जयंती पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए (वर्चुअल) विभागाध्यक्ष, शिक्षा, नालंदा कॉलेज, बिहार शरीफ के शिक्षाविद डॉ. ध्रुव कुमार ने कही।
शिक्षाविद डॉ.किरण सिन्हा ने (वर्चुअल ) ने कहा डॉ. साथी का
सम्पूर्ण जीवन शिक्षा, साहित्य औऱ छात्र के निर्माण में ही समर्पित था। उनके कौशल विकास में अपना तन, मन, धन को निःस्वार्थ सौंप दिया। खासकर युवा छात्र को लेकर सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में लगे रहते थे , इसलिए उन्हें युवाओं के साथी, सबके साथी कहे जाते थे।उनकी सम्पूर्ण कार्यशैली व आचारण आज भी युवाओं के लिए ” सीख के प्रतिविम्ब ” के रूप स्थापित हैं।अपनी कीर्तियों में वो सदैव अमर रहेंगे, मैं उन्हें नमन करती हूं।
गुरुवर साथी सिर्फ़ कहने को एकीकृत संस्कृति के पोषक नहीं
थे बल्कि उन्हें जीते थे। सभी धर्मोंके आदर के साथ ही वो रमजान में शुक्रवार को ‘” रोज़ा “रखते थे,
जो जीवनपर्यंत जारी रहा। हृदयदिल इंसान के साथ ही
” प्रकृति -प्रेमी ” भी अनिल रश्मि
ने कहा। प्रारंभ में उनके तैलचित्र
पर पुष्प व मालाएं अर्पित की गईऔर सर्वधर्म प्रार्थना से कार्यक्रम की समाप्ति हुई।
मंच संचालन : जितेंद्र कुमार पाल
धन्यबाद ज्ञापन : नेक आलम ने किया।
मौक़े पर डा. दिलीप कुमार,
डा. विजयेंद्र चंद्रवंशी, डॉ. करुणा निधि , साहित्यकार प्रभात कुमार धवन, आलोक चोपड़ा, राजा पुट्टू, रोहन कुमार, सुमित कुमार, प्रिंस कुमार, नीतिन कुमार वर्मा , दुधेश्वर प्रसाद गुप्ता,सुनीता रानी , बबली कुमारी ने भी उन्हें आत्माँजलि दी।
