महुआ के पुरानी बाजार में स्थित महावीर मंदिर में चल रहे चार दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा रविवार को हुआ समापन ।
महुआ के पुरानी बाजार में स्थित महावीर मंदिर में चल रहे चार दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा रविवार को हुआ समापन ।
चार दिवसीय के भक्तों ने लगातार शाम को श्रवण लाभ लिया । कथा के अंतिम दिन पंडित कुशेश्वर चौधरी ने कहा कि रामकथा के श्रवण से मन के राग, द्वेष, ईर्ष्या, और भेदभाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यह मन को शांत कर हिंसक भावनाओं का रोकती है। राम नाम की महिमा बतलाते हुए कहा कि राम का नाम अनमोल है, यदि पापी भी राम का नाम लेता है तो उसे सदगति मिल जाती है। जिसके ह्दय में प्रभु के प्रति भाव जागते हैं, जिस पर हरि कृपा होती है। वह मनुष्य ही प्रभु की कथा में शामिल होता है। श्रीराम कथा का मनोयोग से श्रवण कर उसके उपदेश को जीवन में उतारें। तभी कथा की सार्थकता है। मन व ध्यान की एकाग्रता से हर कार्य में सफलता मिलती है। भगवान का आगमन सदैव धर्म की रक्षा के लिए हुआ है। रामायण हमें समाज के संस्कार, अच्छे-बुरे की पहचान सिखाती है। सच्ची भक्ति से ही भगवान की प्राप्ति की जा सकती है। भभुआ से आए हुए कथावाचक श्री आचार्य मानस बिहारी शास्त्री जी महराज ने धनुष भंग की कथा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि धनुष अहंकार का प्रतीक है और अहंकार तोड़ना भगवान का सरल स्वभाव है। उन्होंने कहा कि अहंकार के नाश के लिए गुरु कृपा का होना अति आवश्यक है। जब तक जीवन में अभिमान रहेगा। तब तक भगवान की प्राप्ति संभव नहीं है। भगवान ने स्वयं अवतार लेकर गुरु महिमा का दर्शन करवाया। बिना गुरु कृपा के ज्ञान की प्राप्ति भी संभव नहीं हो सकती। कथा में उन्होंने जनकपुर दर्शन, धनुषभंग, परशुराम संवाद और सीता-राम विवाह का वर्णन किया। श्री राम-सीता के विवाह की कथा सुनाते हुए बताया कि राजा जनक के दरबार में भगवान शिव का धनुष रखा हुआ था। एक दिन सीता ने घर की सफाई करते हुए उसे उठाकर दूसरी जगह रख दिया। उसे देख राजा जनक को आश्चर्य हुआ, क्योंकि धनुष किसी से उठता नहीं था। राजा ने प्रतिज्ञा किया कि जो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी से सीता का विवाह होगा। उन्होंने स्वयंवर की तिथि निर्धारित कर सभी देश के राजा और महाराजाओं को निमंत्रण पत्र भेजा। एक-एक कर लोगों ने धनुष उठाने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। गुरु की आज्ञा से श्री राम ने धनुष उठा प्रत्यंचा चढ़ाने लगे तो वह टूट गया। इसके बाद धूमधाम से सीता व राम का विवाह हुआ। माता सीता ने जैसे प्रभुराम को वर माला डाली वैसे ही देवता फूलों की वर्षा करने लगे। गया से पधारे कथावाचक श्री पंडित अनिल मिश्र जी ने बताया कि सूर्पनखा के पति की हत्या रावण ने की थी। इसलिए सूर्पनखा रावण का विनाश चाहती थी। भगवान राम से रावण की शत्रुता का कारण वह बनी ताकि रावण का विनाश हो। कहा कि जब खरदूषण के वध होने की बात सूर्पनखा ने रावण को सुनाई तो रावण समझ गया भगवान का अवतार हो गया। सोचा तामस देह से भक्ति नहीं होगी तो मुक्ति के लिए उसने भगवान राम से बैर की युक्ति सोची। अनिल मिश्र जी ने कहा कि रावण को विभीषण से प्रेम था। इसलिए उसे अपमानित कर सभा से निकाल दिया ताकि लंका से दूर चला जाए और युद्ध में मारा न जाए। यहां पर मौजूद श्रद्धालुओ ने भंडारे में प्रसाद ग्रहण की । इस मौके पर कार्यक्रम के आयोजक श्री अनिल तिवारी, सभापति ब्रह्मानंद मिश्रा, अभय मिश्रा, अध्यक्ष कामेश्वर राय, सचिव मंगल राय , समाजसेवी राजेश कुमार सिंह, मंटू तिवारी, आदित्य मिश्रा उर्फ बंटी, राजकमल जयसवाल, भाजपा नेता उमेश कुमार , विष्णु महतो, अभिषेक उपाध्याय,सत्यम समीर , मोहन कुमार सिंह एवं सत्संग आयोजक समिति के सदस्य उपस्थित थे ।
