रामायण व महाभारत काल से ही चला आ रहा है छठ महापर्व।
रामायण व महाभारत काल से ही चला आ रहा है छठ महापर्व।
(इस पवित्र व्रत को रखने से सुख शांति की होती है प्राप्ती)।
कौशल किशोर सिंह की रिपोर्ट।
गोरौल। वैशाली। दीपावली के 6 दिन बाद कार्तिक महीने की षष्ठी यानी छठी तिथि को लोक आस्था का महापर्व छठ मनाया जाता है। नहाए खाए के साथ शुरू होने वाले इस पर्व में व्रती और महिलाएं 36 घंटे तक निर्जला उपवास व्रत रखती है एवं छठी मैया की आराधना करती है। इस पवित्र व्रत को रखने से सुख और शांति की प्राप्ति होती है। यश, पुण्य और कीर्ति का उदय होता है। दुर्भाग्य समाप्त हो जाते हैं, निसंतान दंपति को संतान की प्राप्ति होती है। आचार्य पंडित जितेन्द्र तीवारी ने बताया कि रामायण और महाभारत काल से ही महापर्व छठ को मनाने की परंपरा रही है। नहाए खाए के साथ आरंभ होने वाले लोक आस्था के चार दिवसीय महापर्व को लेकर कई कथाएं मौजूद है। एक कथा के अनुसार महाभारत काल में जब पांडव अपना सारा राज पाट जूआ में हार गऐ तब द्रौपदी ने छठ व्रत किया इससे उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हुई तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। इसके अलावा छठ महापर्व का उल्लेख रामायण काल में भी मिलता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ या सुर्य पूजा महाभारत काल से की जाती है। कहते हैं कि छठ पूजा की शुरुआत सूर्यपुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सुर्य के परम भक्त थे। मान्यताओं के अनुसार प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर सुर्य को अर्घ देते थे। सुर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे। अर्घ देते समय पूजा की सामग्री में गन्ने का होना जरूरी होता है। ऐसा माना जाता है कि छठी मैया को गन्ने बहुत प्रिय है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। बताया जाता है कि सूर्य की कृपा से ही फसल उत्पन्न होती है और इसलिए छठ पुजा में सूर्य को सबसे पहले नई फसल का प्रसाद चढ़ाया जाता है। गन्ना उस नई फसल मे से एक है। चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व की शुरुआत नहाए खाए से होती है। इस दिन व्रती स्नान कर नए वस्त्र धारण कर पूजा के बाद चना, दाल, कद्दू की सब्जी और चावल को प्रसाद के तौर पर ग्रहण करती है। व्रती के भोजन करने के बाद परिवार के सभी सदस्य भोजन ग्रहण करते हैं। छठ पूजा के दूसरे दिन को खरना के नाम से जाना जाता है। इस पूजा में महिलाएं शाम के समय चूल्हे पर गुड़ की खीर बनाकर उसे प्रसाद के तौर पर खाती है। इसके बाद महिलाओं का 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार मान्यता है कि खरना पूजा के बाद ही छठी मैया का घर में आगमन हो जाता है। छठ पूजा का तीसरा दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि यानी छठ पूजा के तीसरे दिन व्रती महिलाएं निर्जला उपवास रखती है। साथ ही छठ पूजा का प्रसाद तैयार करती है। इस दौरान महिलाएं शाम के समय नए वस्त्र धारण कर परिवार संग किसी नदी या तालाब पर पानी में खड़े होकर डूबते हुऐ (अस्ताचल गामी) सुर्य को अर्घ देती है। तीसरे दिन का निर्जला उपवास रात भर जारी रहता है। छठ पूजा का चौथा दिन छठ पूजा के चौथे दिन पानी में खड़े होकर उगते यानी (उदीयमान) सुर्य को अर्घ दिया जाता है। इसे उषा अर्घ या पारण दिवस भी कहा जाता है। अर्घ देने के बाद व्रती महिलाएं सात या ग्यारह बार परिक्रमा करती है। इसके बाद एक दूसरे को प्रसाद देकर व्रत खोला जाता है। 36 घंटे का व्रत सुर्य को अर्घ देने के बाद खोला जाता है। इस व्रत की समाप्ति सुबह के अर्घ यानी दूसरे और अंतिम अर्घ को देने के बाद संपन्न होता है। छठ पूजा का विशेष महत्व छठ पूजा का सुर्य भगवान उषा, प्रकृति जल, वायु आदि को समर्पित है. इस त्योहार को मुख्य रुप से बिहार में मनाया जाता है। इस व्रत को करने से निसंतान को संतान की प्राप्ति होती है। यह व्रत संतान की रक्षा और उसके जीवन की खुशहाली के लिए किया जाता है। इस व्रत का फल सैकड़ों यज्ञों से भी ज्यादा होता है। सिर्फ संतान ही नहीं बल्कि परिवार में सुख समृद्धि की प्राप्ति के लिए भी यह व्रत किया जाता है।
