April 18, 2026

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मौलाना आज़ाद के खुदप्रसती और धोख़ा के वजह से है पसमंदा मुसलमान सबसे पीछे

मौलाना आज़ाद के खुदप्रसती और धोख़ा के वजह से है पसमंदा मुसलमान सबसे पीछे..आज़ाद के वजह से 543 सांसद में से 132 सांसद मुफ्त में दे देते है दलित हिंदुओ को

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने भारत की स्वतंत्रता के बाद पसमांदा मुसलमानों के लिए आरक्षण का समर्थन नहीं किया और न उनके लिए आरक्षण की मांग की बल्कि पसमंदा मुसलमान उनके बराबर का न हो जाए इसलिए अंबेडकर के पूछने पे की आप अपने समाज के पिछड़े दलित मुसलमानों के सूची दीजिये तो उन्होंने बड़ी चतुराई से बोल दिया की मुसलमानों में कोई दलित पसमन्दा नही होता हम सब एक है, इसके पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं, जिनमें राजनीतिक और सामाजिक स्थितियाँ प्रमुख हैं।

1. राष्ट्रीय एकता की प्राथमिकता एक ढोंग: मौलाना आज़ाद का उद्देश्य भारतीय समाज की एकता और सामंजस्य बनाए रखना था। पर वो पसमन्दा मुसलमानों के आरक्षण के विरोध में थे, ऐसे में किसी विशेष मुस्लिम समुदाय को आरक्षण का समर्थन करने से उन्हें लगता था कि पसमंदा मुसलमान उनके बराबर में खड़े हो जायेंगे जो मुस्लिम लीग सदियों से नही होने दिया वो में भी नही होने दूंगा और उन्होंने गरीब पसमन्दा मुसलमानों का आरक्षण कांग्रेस के साथ मिलके 10 अगस्त 1950 को छिन लिया और खुद शिक्षा मंत्री बन गए।

2. मुस्लिम समाज में आंतरिक मतभेद: आज़ाद मुस्लिम समाज में वर्ग विभाजन को लेकर अधिक मुखर नहीं थे। वह पसमांदा और अशराफ मुसलमानों के बीच के भेद को खुले तौर पर संबोधित करने में सावधानी बरतते थे। इस वर्ग विभाजन के मुद्दे को न उठाने से वे मुस्लिम समाज को एकजुट रखने का प्रयास कर रहे थे और पसमंदा मुसलमानों को ठग रहे थे,

3. राजनीतिक स्थिति: उस समय मौलाना आज़ाद शिक्षा मंत्री थे और उन्हें कांग्रेस पार्टी के दृष्टिकोण के अनुसार कार्य करना था। इसलिए उन्होंने खुद के और अपने अश्राफ् समाज के लिए पसमंदा मुसलमानों के लिए आवाज़ नही उठाया, आज़ाद के कार्यकाल में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण तो था, लेकिन पसमांदा मुसलमानों के लिए नहीं। यह संभव है कि वे आरक्षण के मुद्दे पर किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते थे, ताकि उनका मंत्री पद और प्रभाव कायम रह सके।

4. वैचारिक मतभेद: आज़ाद एक राष्ट्रीय नेता थे और धर्म के आधार पर विशेष सुविधाएँ देने के पक्ष में न थे क्योकि अगर पसमंदा ही उनकी तरह नेता बन जायेगा तो उनका झोला कौन ढोयेगा इसलिए वो पसमंदा मुसलमानों को मस्ज़िद तक सीमित रखा और सामाजिक न्याय और अधिकार से वंचित रखा जिसका खामियाजा हम आज तक भुगत रहे हैं,

इन कारणों से, मौलाना आज़ाद ने पसमांदा मुसलमानों के लिए आरक्षण के मुद्दे को सीधे नहीं उठाया। उनके कार्यकाल के दौरान पसमांदा समुदाय के मुद्दे अधिकतर अनसुने रह गए और मुसलमान धीरे धीरे सामाजिक अधिकार और तरक्की से वंचित रह गए।।
आपका अपना
इरफान जामियावाला

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