पंजाब केसरी लाला लाजपत राय एवं सरदार अजीत सिंह की 96वीं एवं 77वीं मृत्यु वार्षिकी श्रद्धा पूर्वक मनाया गया।
पंजाब केसरी लाला लाजपत राय एवं सरदार अजीत सिंह की 96वीं एवं 77वीं मृत्यु वार्षिकी श्रद्धा पूर्वक मनाया गया।
महुआ 17 नवंबर 2024, ऑल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन के अनुमंडल कमेटी महुआ के तत्वाधान में ग्राम पंचायत राज मगुराही में संगठन के राज्य उपाध्यक्ष ललित कुमार घोष की अध्यक्षता में पंजाब केसरी लाला लाजपत राय एवं सरदार अजीत सिंह की 96वीं एवं 77वीं मृत्यु वार्षिकी श्रद्धा पूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर संगोष्ठी को संबोधित करते हुए संगठन के राज्य उपाध्यक्ष ललित कुमार घोष ने कहा कि पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन के नेता लाला लाजपत राय और सरदार अजीत सिंह जन्म से ही विलक्षण प्रतिभा के थे और गैर समझौतावादी धारा के महानायकों में से द्वैएक थे। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने निर्जन क्षेत्रों में बस्तियां बसाने के लिए चिनाब नदी से लायलपुर (अब पाकिस्तान में)तक पानी लाने के लिए एक नहर का निर्माण किया था। सरकार ने जालंधर,अमृतसर और होशियारपुर के किसानों और भूतपूर्व सैनिकों को कई सुविधाओं के साथ-साथ मुफ्त जमीन देने का वादा करके उन्हें वहां बसने के लिए राजी किया था। इन जिलों के किसान अपनी जमीन और संपत्ति छोड़कर नए इलाकों में आकर बस गए और बंजर जमीन को खेती के लायक बनाने के लिए कड़ी मेहनत की लेकिन, जैसे ही उन्होंने यह कार्य पूरा किया ब्रिटिश सरकार ने उपजाऊ जमीन पर किसानों को मालिकाना हक से वंचित करने और उस पर अपना मालिकाना हक घोषित करने के लिए उपनिवेशीकरण अधिनियम और दोआबा बारी अधिनियम लागू कर दिया । नए कानूनों ने किसानों को महज बटाईदार बना दिया।उस जमीन पर झोपड़ी बनाने या उक्त जमीन को बेचने और खरीदने का अधिकार भी उन्हें नहीं दिया गया। इससे बड़े पैमाने पर किसान भड़क गए और स्वत: ही सड़कों पर उतर आए। सरदार अजीत सिंह और लाला लाजपत राय ने इन किसानों को संगठित किया और उन्हें एक दिशा दी। इस आंदोलन की उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि यह किसानों की मांगों की संकीर्ण सीमा तक सीमित नहीं था। इसने ब्रिटिश राज के खिलाफ आवाज उठाई। सरदार अजीत सिंह और लाला लाजपत राय ने इस आंदोलन को ब्रिटिश विरोधी आंदोलन में बदल दिया। यहां तक की कुछ स्थानों पर सेना के जवान भी इस आंदोलन में शामिल हो गए। ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने की पूरी कोशिश की लेकिन वह असफल रही। अंतत: उसने 9 मई 1907 को लाला लाजपत राय को गिरफ्तार कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया। कुछ दिन बाद सरकार ने 2 जून 1907को सरदार अजीत सिंह को भी गिरफ्तार कर उसी जेल में भेज दिया। इस विशाल किसान आंदोलन के परिणाम स्वरूप और सेना में विद्रोह के डर से ब्रिटिश सरकार ने अधिनियमों को वापस ले लिया और किसानों को मालिकाना हक दे दिया तथा सरदार अजीत सिंह और लाजपत राय को अक्टूबर 1907 में मांडले जेल से रिहा कर दिया। किसान आंदोलन विजय हुआ। सरदार अजीत सिंह और लाला लाजपत राय हमारे इन दो राष्ट्रीय नायकों के नेतृत्व में इस आंदोलन ने हमें मेहनतकश किसानों के हित के लिए लड़ने का रास्ता दिखाया। उनके पद चिन्हों पर चलते हुए कामरेड शिवदास घोष की शिक्षाओं को अपने दिल में लेकर ऑल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन के हम कार्यकर्ता देश-विदेश की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ लंबी लड़ाई संगठित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। जीत हमारी होगी।”हम लड़ेंगे हम जीतेंगे”। स्थानीय स्तर पर डीएपी खाद के कालाबाजारी,एमएसपी गारंटी कानून बनाने, बिजली बिल अधिनियम 2022 रद्द करने व किसान-खेत -मजदूरों को ₹10000 पेंशन देने आदि मांगों को लेकर 18 नवंबर 2024 को जिला पदाधिकारी वैशाली के समक्ष जन प्रदर्शन में सैंकड़ों किसान मजदूर को शामिल होने का आवाहन किया। दूसरी ओर कन्हौली धनराज पंचायत में राम पुकार राय, प्रमोद राय, जगन राय,दिनेश राय , कन्हौली बिशनपरसी पंचायत में जीतू पासवान, रामनरेश राम, विक्की कुमार, टुनटुन कुमार,मगुराही गांव में विश्वनाथ साहू,शिवनाथ कुमार,पंकज कुमार, सिंह राम पंचायत में सूरज मिश्रा, राज मंगल राय, प्रिंस कुमार, अनिल राय आदि के नेतृत्व में विभिन्न गांवों में लाजपत राय एवं सरदार अजीत सिंह की मृत्यु वार्षिकी श्रद्धा पूर्वक मनाया गया।
