May 4, 2026

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ज़कात टुकड़ों में बाँटने के लिए नहीं है बलके मिल्लत के कमज़ोर तबक़ात को मज़बूत बनाने के लिए है।

ये एक कड़वा सच है जकात के नाम पर रिश्तेदार करिबियों परोसिये गरीब गुरबा की आर्थिक माली मदद का मुतालबा होता है तो गधे के सिर से सिंग जेसे गायब हो जाते हैं

मधुबनी संवाददाता

 

*ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के मेम्बर जनाब मौलाना अबू तालीम रहमानी साहब के ज़कात के ऊपर बहुत बड़ा और चौंकाने वाला बयान आप पूरा सुने, और अमल करने की कोशिश करें।*
*जो वीडियो नहीं देख सकते उनके लिए मोटी मोटी बातें नीचे हैं।*
19/03/2024

1-100 में 2.5 ₹ के बजाय 10 ₹ निकालें, 2.5 % ज़कात में इस्तेमाल होंगे बाक़ी 7.5% कम्युनिटी डेवलपमेंट, बिना जात धर्म देखे इस्तेमाल करें।

2-ज़कात फ़र्ज़ इस लिए हुई ताके मुसलमानों की ग़रीबी दूर हो सके, मदीने में जब ज़कात फ़र्ज़ हुई तो पहली ज़कात आयी और 8 महीने में मदीने के मुसलमानो की ग़रीबी दूर हो गई, सिर्फ़ 8 महीने में।

75 साल से हिंदुस्तान में ज़कात निकाल रहे ग़रीबी की तादाद दूर होने के बजाए भिखारियों की तादाद बढ़ती चली जा रही है।

ज़कात टुकड़ों में बाँटने के लिए नहीं है बलके मिल्लत के कमज़ोर तबक़ात को मज़बूत बनाने के लिए है।

3-आज अपनी मिल्लत को इतनी मज़बूत बना दीजिए के 2024 में ज़कात लें वो 2025-2026 में ज़कात देने वे बन जाएँ।
अगर ये कॉन्सेप्ट नहीं ले पा रहे तो आने वाले 1000 साल तक भी ज़कात बाँटते रहेंगे…

4-सिस्टम न होने की वजह से हमारी ज़कात निकलती चली जा रही है भिखारियों की तादाद बढ़ती चली जा रही है।
पहले ये तय कीजिए के हम भिखारी मुक्त समाज बनाएँगे।

5-ज़कात माल का मैल है और मदरसे में तैयार होने वाले क़ौम के सरबराह मैल खा कर तैयार नहीं हो सकते।
आप अगर मैल खिला कर उलमा तैयार करेंगे तो प्रोडक्ट आपके सामने हैं।

आप ही कहते हैं जुमे में बयान में जान नहीं है, हक़ बात उलमा बोलते नहीं हैं। क़ायदत की सलाहियत नहीं है, भाई जो मटेरियल आपने भेजा था तो ऐसे ही माल तैयार होकर आना था आ गया। आपने कौन सा फ्रेश माल भेजा था।
इतने बड़े तालीम के लिए इतना कचरा माल, ये कहीं सूट कर रहा है। ये वैसा ही है के बादशाह को फ़क़ीरों का लिबास, ठीक है किसी ज़माने में इसकी ज़रूरत थी।लेकिन आज नहीं है।

6-आप अपना फ्रेश पैसा मस्जिदों को दें मदरसों को दें ताके कल को मदरसे वालों को ये एलान न करना पड़े मेरे मदरसे में ग़रीब,यतीम, लूल्हे, लंगड़े, अंधे, अपाहज पढ़ते हैं, आप अपना सदक़ा दीजिए ख़ैरात दीजिए ज़कात दीजिए- ये सुन कर कौन डॉक्टर वकील अपने बच्चे को मदरसे में दाखिल कराएगा?

आप फ्रेश पैसे दीजिए ताकी मदरसे वाले भी कहें के हमारे मदरसे में तालीम दी जाती है, दीन की तालीम और दुनिया की तालीम क्या चीज़ है तालीम के फ़र्क़ ने हमे ज़बह कर दिया।

7-आप के ज़कात के पैसे जाने कहाँ चाहिए? मदीने में जब ज़कात वसूल की गई थी तो कहाँ रखी गई थी? मस्जिद नब्वी S.A में, मस्जिद नब्वी में बैतूलमाल क़ायम की गई।

आप के मोहल्ले के मस्जिद में आप बैतूलमाल क़ायम कीजिए,साफ़ पैग़ाम है आप अपने मोहल्ले में बैतूलमाल क़ायम कीजिए। ज़कात सदक़ा फ़ितरा वहाँ जमा कीजिए,
वहाँ की कमिटी उसकी कस्टोडियन और ज़िम्मेदार होगी, अगर लोकल कमिटी गड़बड़ करेगी जोहर में गड़बड़ करेगी असर में पकड़ी जाएगी।

लेकिन अगर कहीं और जमा कर दिये आप को पता भी नहीं कहाँ इस्तेमाल हो रहा।

8-मस्जिद कमिटी के पास अपने सराउंडिंग 40-40 घर आगे पीछे दायें बाएँ 160 घर की सर्वे रिपोर्ट होनी चाहिए।

जहाँ हम करोड़ों ₹ ज़कात निकालते हैं वहाँ एक बूढ़ा आदमी मस्जिद के बाहर इलाज के लिए या बेटी की शादी के लिए भीख माँगता है बड़े शर्म की बात है, हमारे पैसे जा कहाँ रहे हैं?

बस आप ये तय कर लें के आप के मोहल्ले में कोई भीक न माँगे।

9-पूरी ईमानदारी,ट्रांसपेरेंसी और दयानतदारी के साथ आप उस माल को इस्तेमाल करें। के हमारे यहाँ ग़ुरबत न रहे।

अगर 10 साल हम लोग इसपे मुनज्ज़म तरीक़े से काम कर लें के हमारे पैसे हमारे बैतूलमाल में। हर मस्जिद में बैतूलमाल क़ायम हो जाए, आप की मस्जिद मालदार हो सकती है पड़ोस की मस्जिद कुछ ग़रीब हो सकती है आप पड़ोस की मस्जिद को भी खड़ा कर सकते हैं।

अगर 10 साल हम लोग काम कर लिए तो ज़कात लेने वाली नहीं ज़कात देने वाली क़ौम बन जाएँगे। फिर हम लोग हिंदुस्तान की ज़रूरत बन जाएँगे न के बोझ।

आज हम 10 ₹ की भीख दे कर बहुत बड़े इंसान समझते हैं, जुमा पढ़ के निकले नोट के बंडल निकाला दे के चले गए, आप भिखारियों को प्रमोट कर रहे हैं।आप अनजाने में समाज को नुक़सान पहुँचा रहे हैं, आप पेशावर भिखारी को आज 1 लाख ₹ दे दें कल दुबारा वहीं पे खड़े रहेंगे।

जब आप मुल्क को देने वाले बन जाएँगे तो ये मुल्क आप से नफ़रत करेगा या सलाम करेगा?

हिंदुस्तान की बड़ी तंज़ीमें बड़ी जमातें बैतूलमाल के सिलसिले में मुफ़ीद डिज़ाइन बनाई हैं मशवरे दिए हैं काम करने के तरीक़े बताए हैं उनको हम ज़रूर ले लें ताके हमारे यहाँ दयानत दारी बाक़ी रहे,और हम अपने पैसों को अल्लाह के रास्ते में अल्लाह की रज़ा के लिए बेहतर तरीक़े से खर्च कर पाएँ।

10-कमीशन पर चंदा एक मुस्तकील धंधा है हिंदुस्तान में, 50% मामूली बात है, आपने 1000₹ ज़कात के दिए, 500₹ वसूलने वाले ने रखा और 500₹ इदारे ने रखा, आप उलमा किराम मुफ़्तियाने किराम से पूछ लीजिए आपकी ज़कात कितनी अदा हुई। मेरी मालूमात में आपकी ज़कात उतनी अदा हुई जितनी इदारे तक पहुँची है।
आप मुजरिम रह गए ज़कात आपकी अदा नहीं हुई माल आपका पाक नहीं हुआ।
हम तो उन्हीं फ़तवों पर बात कर रहे जो फ़तवे आ चुके हैं। आप फ़तवा ले आइए हमे कोई दिक़्क़त नहीं है।

दारुल उलूम फ़तवा दे दे।
मज़ाहिर उलूम फ़तवा दे दे।
नदवा फ़तवा दे दे।
बरेली शरीफ फ़तवा दे दे।

के नहीं साहब कमीशन हम ले सकते हैं फिर मैं देखूँगा क्या बोलना है।

हिंदुस्तान के मुसलमान का माल महफ़ूज़ नहीं है कियूँकि उनके माल के साथ ये खेल खेला जा रहा है। आपकी की तवज्जो इसपे रहनी चाहिए।

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