आखिर कब होगा वित्तरहित विद्यालयों का कल्याण?- आशुतोष कुमार सिंह
*वित्तरहित कर्मियों के मन में उठ रहे अनुत्तरित सवाल…*
विभूतिपुर/समस्तीपुर
आखिर कब होगा वित्तरहित विद्यालयों का कल्याण? वित्तरहित कर्मियों के मन में उठ रहे है कई अनुत्तरित सवाल। उक्त बातें बिहार वित्त अनुदानित माध्यमिक शिक्षाकर्मी मंच पटना के प्रदेश महासचिव आशुतोष कुमार सिंह ने अपने आवास विभूतिपुर के कल्याणपुर दक्षिण पंचायत अंर्तगत समर्था में कही। उन्होंने बताया कि दशकों पहले बच्चों को पढने के लिए विद्यालय के अभाव में दूर दराज जाना पड़ता था , इसलिए ग्रामीणों ने सरकार के मानक को सरकार से स्थापना अनुमति प्राप्त कर इन संस्थानों की स्थापना की। तब से ये सभी संस्थान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का काम कर रहा है। 2008 में तत्काल मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने वित्त रहित के समाप्ति की घोषणा कर इन संस्थाओं को परीक्षाफल आधारित अनुदान देना शुरू किया। हलांकि सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति के कारण वर्षों का अनुदान लंबित चला आ रहा है।शिक्षा कर्मियों द्वारा वर्षों से नियत वेतन की मांग की जा रही है। कितने धरना प्रदर्शन हुए, लेकिन सरकार के ” कान पे जूं तक नहीं रेंग” रही! कई बार चुनावी घोषणाएं एवं वादे किए गए लेकिन हुआ “ढाक के तीन पात ” दशकों बीत जाने के बावजूद इन कर्मियों के मन में कई सवाल अनुउत्तरित चल रहे हैं! आज की परिस्थिति में इन लोगों के पास निम्न प्रश्नों का कोई जबाब नही है। प्रश्न –
1.न्यायालय के आदेश के बावजूद,
2. विधानसभा में पारित प्रस्ताव के बावजूद,
3. उच्च स्तरीय कमेटी बनने के बावजूद,
4.शिक्षा मंत्री के आश्वासन के बावजूद,
5. चुनावी घोषणा होने के बावजूद,
6. उपमुख्यमंत्री क्या आश्वसन के बावजूद,
7. ठंडा बस्ता में रखा हुआ है आखिर क्यों?,
8.आखिर में किसी भी राजनेता को कोई इसमें रुचि क्यों नहीं है?,
9.क्या इन कर्मियों के कल्याण के बिना बिहार का विकास हो सकेगा?
उन्होंने बताया कि मेरा मानना है कि 45 वर्षों से चल रहे इन संस्थानों के कर्मियों की समस्याओं का स्थायी समाधान जब तक नहीं होता, तब तक बिहार का विकास अधूरा ही रहेगा। लंबे समय से सामान शिक्षा देने वाले इन संस्थाओं के साथ सौतेलापन आखिर कब तक किया जाएगा? कभी जांच के नाम पर कोड का निलंबन या अनुदान देने के नाम पर नई नियमावली। सभी के द्वारा इन शिक्षा कर्मियों का शोषण होता रहा। सरकार कर्मियों के वेतन की मांग को खारिज कर करती रही।
वेतन की आश लगाए कितने लोग धरा को छोड़ चले लेकिन सरकार की कुंभ करणी निद्रा नही टूटी। सरकार 19 वर्ष पूर्व निर्धारित अनुदान के दर पर भी तनिक विचार करने को तैयार नही है। इन संस्थानों में अधिकांश शोषित, वंचित और गरीब तबके के बच्चे पढ़ते हैं।शिक्षाकर्मियों की सुधि लेने वाला कोई नहीं है, ऐसा महसूस किया जा रहा है। आश्वासन पर आश्वासन मिल रहा है । एक महीने में कमेटी रिपोर्ट करेगी, तो सरकार इस पर विचार करेगी।सरकार के इस रवैये से सनी देओल के ताजा हो जाती है “तारीख पे तारीख…..”
सरकार अभिलंब सीएम अनुदानित शिक्षा कर्मियों को नियत वेतनमान दे, यह हमारी मांग है। तभी बिहार से वित्त रहित का कलंक समाप्त हो पाएगा और बिहार का वास्तविक विकास समझा जाएगा ।
