दलित मुसलमानों की अनसुनी आवाज़ आयोगों के दरवाज़े बंद क्यों हैं पासमंदा समाज के लिए?
NR इंडिया न्यूज़/ विशेष
दलित मुसलमानों की अनसुनी आवाज़
आयोगों के दरवाज़े बंद क्यों हैं पासमंदा समाज के लिए?
लेखक: इरफान जामियावाला, पासमंदा चिंतक
➤ 85-90% आबादी: देश के मुसलमानों में पासमंदा, अंसारी, मनिहार, धुनिया, नट, फकीर जैसे मेहनतकश तबके 85-90% हैं।
➤ 3% का कब्ज़ा: फिर भी वक्फ बोर्ड, उर्दू अकादमी, मदरसा बोर्ड और अल्पसंख्यक आयोगों पर शेख, सैयद, पठान, मलिक जैसे 3% अशराफ वर्ग का कब्ज़ा है।
➤ बड़ा सवाल: लेखक पूछते हैं – चेयरमैन और सदस्य हमेशा प्रभावशाली परिवारों से ही क्यों चुने जाते हैं? क्या पासमंदा मुसलमान इस देश के नागरिक नहीं हैं?
➤ ज़मीनी सच्चाई: दलित मुसलमानों की बस्तियों में शिक्षा बदतर है। बेरोजगारी, गरीबी और भेदभाव उनकी नियति बना दी गई है।
➤ मांग: “सबका साथ, सबका विकास” सिर्फ नारा न रहे। आयोगों, प्रशासन और नीति निर्माण में पासमंदा समाज को बराबर की भागीदारी मिले।
संदेश: देश को नफरत नहीं, न्याय चाहिए। प्रतिनिधित्व चाहिए। सम्मान चाहिए। हर कमजोर तबके को बराबरी का अधिकार चाहिए। यही संविधान की भावना है।
