गुरुदयाल शास्त्री की अधूरी रह गई सपना ,महुआ महोत्सव के आयोजन का ।रिपोर्ट सुधीर मालाकार । महुआ (वैशाली )महुआ के महान साहित्यकार ,पत्रकार जगत के स्तंभ गुरुदयाल शास्त्री का निधन शून्यता कर दी है, जिसे निकट भविष्य में भरपाई होना दुर्लभ है। स्वर्गीय शास्त्री अपने जीवन में साहित्य के साथ-साथ समाज व देश की हर पहलू पर अपनी नजर रखा करते थे ।चाहे वो खेल तमाशा हो, चाहे नाटक संगीत, निबंध लेखन हो या वाद विवाद प्रतियोगिता, सभी जगह अपनी पहचान रखने वाले गुरुदयाल शास्त्री की एक अधूरी सपना रह गई, महुआ महोत्सव के आयोजन की । बताते चलें कि जब 90 के दशक में महुआ अनुमंडल का निर्माण हुआ था, तो पहले वर्ष में स्थापना दिवस बड़े ही धूमधाम से मनाई गई थी ।उस आयोजन में स्वर्गीय शास्त्री ने तत्कालीन महुआ विधायक मुंशी लाल पासवान के सानिध्य में अहम भूमिका निभाई थी । उनकी इच्छा थी कि प्रत्येक वर्ष महुआ अनुमंडल की स्थापना दिवस के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो, लेकिन किसी कारणवश इसका आयोजन न हो सका ।विगत 2015 में तत्कालीन कला संस्कृति मंत्री शिवचंद्र राम के नेतृत्व में महुआ महोत्सव का आयोजन का इन्होंने सूत्रपात रचा था। इसकी तैयारी पूर्ण हो चुकी थी, इसके लिए एक स्मारिका का भी विमोचन होना था ,लेकिन दुर्भाग्यवश किसी बड़े नेता के निधन से राष्ट्रीय शोक की घोषणा हुई और फिर महुआ महोत्सव का आयोजन ज्यों की त्यों धरी रह गई। तब से आज तक महुआ महोत्सव के लिए स्थानीय विधायक पर हमेशा जोर देते रहे लेकिन किसी भी जनप्रतिनिधि ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया ।आखिर स्वर्गीय शास्त्री की अधूरी सपना महुआ महोत्सव का आयोजन कब होगी ? वे महुआ फुटबॉल क्लब से बड़ा लगाओ रखते थे, जिसके कारण क्लब से जुड़े खिलाड़ियों ने उनके निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त की है। पत्रकारों के हित का ख्याल रखते हुए उन्होंने महुआ अनुमंडल पत्रकार क्लब की स्थापना की। जिसमें महुआ अनुमंडल क्षेत्र के सभी पत्रकारों को जोड़ कर उनके हितों की रक्षा, मान सम्मान के लिए वे हमेशा प्रयत्नशील रहे। प्रत्येक वर्ष पत्रकार क्लब की स्थापना के अवसर पर बड़े आयोजन किया करते थे ।जब से वे बीमारी से ग्रसित होते चले गए धीरे धीरे महुआ की सांस्कृतिक गतिविधियां विलुप्त होती चली गई ।कभी महुआ थाने के पास महुआ क्लब के नाम से एक संस्था हुआ करती थी ।जहां पर तमाम पदाधिकारी ,जनप्रतिनिधि एवं पत्रकार उसके सदस्य बन सामाजिक कार्यों को किया करते थे ।महुआ से देसरी जाने वाली सड़क में राजेंद्र आश्रम जिस पर कभी आजादी के दीवाने रहकर क्रांति की बिगुल फूंका करते थे उसकी रक्षा हेतु भी उन्होंने अपने कलम के माध्यम से आवाज उठाई ।आज की अंधी और बहरी प्रशासन, सत्ता लोलुप्त जनप्रतिनिधि ,केवल स्वार्थ की बातें सोचा करते है ,कोई भी साहित्य ,सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा करने वाला नहीं दिखाई पड़ रहा है । हम सभी साहित्यकार, पत्रकार भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट कर स्थानीय जनप्रतिनिधियों पदाधिकारियों से उनके अधूरे सपने पूरा करने की चाहत रखते हैं । विनम्र श्रद्धांजलि ।