वन एशिया अंतर्राष्ट्रीय व्याख्यान सीरीज में राहुल सांकृत्यायन पर चर्चा – हाजीपुर की तरफ से नीतू नवगीत ने लिया भाग
वन एशिया अंतर्राष्ट्रीय व्याख्यान सीरीज में राहुल सांकृत्यायन पर चर्चा
– हाजीपुर की तरफ से नीतू नवगीत ने लिया भाग
9 अप्रैल
वन एशिया फाउंडेशन, जापान तथा एमिटी यूनिवर्सिटी हरियाणा के संयुक्त तत्वावधान में एक एशिया समुदाय सिद्धांत पर व्याख्यान सीरीज का आयोजन किया गया । कार्यक्रम में एमिटी यूनिवर्सिटी के विदेशी भाषा विभाग तथा दक्षिण-पूर्व एशिया अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ संतोष कुमार गुप्ता ने कहा कि एशिया के कई देशों के सांस्कृतिक मूल्य एक समान हैं । बौद्ध धर्म के प्रभाव में आने वाले सभी देशों ने शांति और साहचर्य को जीवन का मूल मंत्र बनाया । एशिया के विभिन्न देशों के सांस्कृतिक एवं सामाजिक समानता के अध्ययन पर विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है । इससे एशिया के देशों के आपसी संबंधों में मधुरता आएगी । राहुल सांकृत्यायन ने भी कई एशियाई देशों की यात्रा करके एशियाई देशों के बीच के समानता पर बल दिया । राहुल सांकृत्यायन के जन्मदिन पर आयोजित विशेष व्याख्यान में बिहार की डॉ नीतू कुमारी नवगीत ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन को भारत का प्रथम घुमक्कड़ साहित्यकार माना गया है । उन्होंने श्रीलंका चीन, नेपाल, तिब्बत, कोरिया, जापान, मंगोलिया, सोवियत संघ, जर्मनी, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित दर्जनों देशों की यात्राएं की और वहां के वृतांत लिखे । अपने यात्रा विवरणों में उन्होंने विभिन्न देशों की सांस्कृतिक यात्रा से जुड़े पहलुओं को उजागर किया इसलिए वह एशिया की सांस्कृतिक एकता के भी अग्रदूत हुए । एशिया अध्ययन की अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ सुश्री एलेना पुलेंस्कोवा ने भारत और रूस के बीच के सांस्कृतिक संबंधों पर अपना व्याख्यान दिया । उन्होंने कहा कि सलमान रशदी और अरुंधति रॉय सहित भारत के अनेक लेखक रूस में बहुत ही लोकप्रिय हैं । भारत की यात्रा करने वाले प्रथम रूसी व्यापारी यात्री निकितिन के जीवन पर भारत में फिल्म भी बना है । उन्होंने कहा कि कई मायनों में रूस का समाज और भारतीय समाज एक जैसा है ।
दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ वीरेंद्र सिंह नेगी ने हिमालय अध्ययन पर जोर देते हुए कहा कि हिमालय क्षेत्र के जलवायु में लगातार परिवर्तन आ रहा है जो चिंता का विषय है । गर्मी बढ़ने से हिमालय क्षेत्र के जंतुओं और पेड़ पौधों पर प्रतिकूल असर पड़ा है । उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पहले सेव की खेती 15 मीटर की ऊंचाई पर होती थी लेकिन अब 2500 से 3000 मीटर की ऊंचाई पर सेव की खेती होने लगी है । दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ विंध्यवासिनी पांडे ने भी कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर हिमालय क्षेत्र की वनस्पतियों पर पड़ा है । कई पुरानी प्रजातियां नष्ट हुई है तो कुछ नई प्रजातियां भी देखने को मिल रही हैं ।
