आनंद मार्ग प्रचारक संघ के आचार्य रघुरामानंद अवधूत ने पातेपुर में आनंदमार्गी भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि एकमात्र ब्रह्म ही गुरु हैं।
पातेपुर से मोहम्मद एहतेशाम पप्पु की रिपोर्ट।
गुरु पूर्णिमा पर आनंद मार्ग प्रचारक संघ के आचार्य रघुरामानंद अवधूत ने पातेपुर में आनंदमार्गी भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि एकमात्र ब्रह्म ही गुरु हैं। वे ही विभिन्न आधार के माध्यम से जीव को मुक्ति पथ का संधान लगा देते हैं। ब्रह्म को छोड़कर कोई भी गुरु पदवाच्य नहीं है। गुरु-शिष्य परम्परा को ‘परम्पराप्राप्तम योग’ कहते है। गुरु-शिष्य परंपरा का आधार सांसारिक ज्ञान से शुरू होता है,परन्तु इसका चरमोत्कर्ष आध्यात्मिक शाश्वत आनंद की प्राप्ति है, जिसे ईश्वर -प्राप्ति व मोक्ष प्राप्ति भी कहा जाता है। बड़े भाग्य से प्राप्त मानव जीवन का यही अंतिम व सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए। मान्यता रही है कि ज्ञान मात्र पुस्तकों से ही नहीं प्राप्त होता है वरन “ज्ञान”का पहला केन्द्र
परिवार होता है। बालक का पहला शिक्षक उसकी माता व पिता, दूसरा शिक्षक आचार्य एवं तदुपरान्त अन्त में सद्गुरू के पास पहुँचता है। प्राचीन शिक्षा के दो प्रमुख स्तम्भ रहें हैं गुरू और शिष्य। गुरू तथा शिष्य की विशेषताओं तथा उनके परस्पर संबंधों को जाने बिना शिक्षा पद्धति को ठीक प्रकार से नहीं जाना जा सकता है
