किराना फसलों में खैनी की खेती भी किसानों को दे रही धोखा रोपनी के साथ ही तंबाकू की खेती में शुरू हो जाती है मेहनत की खेल
किराना फसलों में खैनी की खेती भी किसानों को दे रही धोखा
रोपनी के साथ ही तंबाकू की खेती में शुरू हो जाती है मेहनत की खेल
खैनी की फसल लगाकर किसान बेटी के तय करते हैं रिश्ते
महुआ, नवनीत कुमार
कोरोना काल से किसान आर्थिक संकट में डूबे हैं। वे इस संकट से उबर नहीं पा रहे हैं। खेती भी धोखा दे रही है। नगदी किराना फसलों में खैनी की खेती कर किसान घर की जरूरतों को पूरा करना तो चाहते हैं पर मौसम प्रतिकूल होने के कारण उनका पूंजी भी चली जाती है।
खैनी की खेती में किसानों का अरमान जुड़ा होता है। वे इसकी खेती काफी मेहनत से करते हैं। इसकी खेती की शुरुआत ही मेहनत से होती है जो अंत तक लगी रहती है। पूरे परिवार मिलकर खैनी की तैयारी करते हैं। अगर मौसम साथ दिया तो लगाई गई पूंजी दुगनी होती है। अन्यथा वे न घर के न घाट के रहते हैं। इस बार भी मौसम तंबाकू उत्पादक किसानों के लिए प्रतिकूल रहा है। ओला गिरने से खैनी उत्पादकों को भारी क्षति पहुंची है। बावजूद जो फसल बची है उसे तैयार करने में किसान लगे हैं। उन्हें आशा है कि इसकी बिक्री फौजी और उनका आर्थिक संकट दूर होगा। शुक्रवार को यहां फतेहपुर पकरी में खैनी की तैयारी कर रहे सोनेलाल राय ने बताया कि उन्होंने 16 कट्ठे में इसकी खेती की थी। इसकी खेती कहने में मेहनत के साथ पूंजी भी अधिक लगती है। उन्होंने बताया कि तंबाकू की खेती करने के लिए प्रति कट्ठा 03 हजार खर्च आती है। अगर मौसम साथ दिया तो पूंजी दुगनी बनकर आती है। नहीं तो वह न घर के न घाट के। उन्होंने बताया कि तंबाकू की खेती से उनके अरमान जुड़े होते हैं। इसकी खेती कर किसान परिवार बेटियों के रिश्ते टाइगर उसके हाथ पीले करते हैं। किसान परिवार में आर्थिक संकट दूर करने का एक साधन खैनी है।
सरैसा खैनी के नाम से प्रसिद्ध है महुआ इलाका:
महुआ अनुमंडल क्षेत्र रईसा सैनी के नाम से प्रसिद्ध है यहां की खैनी की मांग दूसरे प्रदेशों में अधिक है। यहां किसान खैनी की तैयारी कर बंडल बनाकर दूसरे प्रदेश में ले जाते हैं और इसकी बिक्री करते हैं। यहां प्रेमराज, पकड़ी, चांदसराय, बकसामा, मजिया, छौराही, फतेहपुर, चकफतेह, सिंहराय, मधौल, गंगटी, करहटिया, पहाड़पुर, कुशहर, हरपुर आदि के अलावा पातेपुर प्रखंड का भाग खैनी उत्पादक के नाम से जानी जाती है। किसान बताते हैं कि कोरोना काल के कारण उनकी माली स्थिति काफी खराब हुई है। पूंजी लगाकर खेती तो करते हैं लेकिन उपज का सही दाम नहीं मिल पाता। तंबाकू की खेती बड़े अरमान से की थी। पर इसके खरीदार नहीं मिल रहे हैं। एक तो प्रकृति के प्रतिकूलता के मारे उबर नहीं रहे हैं। दूसरे में महंगाई उनकी माली हालत बिगाड़ रही है। उनका कहना है कि एक ओर सारे सामानों की कीमत काफी बढ़ गई है। जबकि किसानों की उपज का खरीदार नहीं होने कारण औने पौने भाव में बेच रहे हैं। इस समय किसान भारी संकट में है।
