रमजान का महीना और रोजा हमें क्या सिखाता है,
रमजान का महीना और रोजा हमें क्या सिखाता है,
रिपोर्ट ज़ाहिद सरसी,गोरौल वैशाली
रमजान का महीना पाक ( पवित्र ) महीना माना जाता है रमजान का महीना इबादत का महीना कहा जाता है इस महीने में इबादत करने वाले का अल्लाह ( ईश्वर ) सभी दुआएं कबूल करता है , लेकिन उसकी इबादत( भक्ति ) कैसे करना ये सबसे अहम बात ( मुद्दा ) है हम दिन भर रोजा ( उपवास) रखें और दुकानदारी करते समय ग्राहक से झूठ बोल कर पैसा लें, हराम खोरी करें, झूठ बोलें, जुआ खेलें , दुसरे की बुराई करें, नाजायज तरीके से पैसा कमाएं, ग़लत काम करने वालों का साथ दें, अपने पड़ोसी को सताएं चाहे वो किसी जाति धर्म का हो , ग़लत नजरो से देखते रहे, ग़लत सुनते रहे, किसी का दिल दुखाते रहें , दुसरे का माल हर्फ कर अपना बनाते रहें , हम भर पेट खाएं और पड़ोसी भुखा रहे , तो ऐसा रोजा किसी काम का नही है , ये सब मुसलमान को पहले ही मना है, रमजान का महीना बुराईयों को खत्म करने का महीना है यहां से पाक साफ ( पवित्र ) होकर नई जिन्दगी की शुरुआत करना है और इसके बाद ज़िन्दगी ( जीवन) मे अपने अंदर बुराइयों ( पापों) से बचते रहना है। तभी जाकर अल्लाह ( ईश्वर) हमारी दुआ कबूल करेगा। रमजान का महीना उर्दू कैलेंडर का 9 वा महीना है इसी महीने में पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्ल्लाह व आलेही वसल्लम पर कुरान भी नाजिल हुआ( उतरा) , रमजान का रोजा सभी बालिग औरत मर्द पर फर्ज है, वहीं कुछ लोगों को इसकी छूट दी गई है जैसे , बीमार वायक्ति , सफर ( यात्रा )करने वाले, हामला ( गर्भवती ) महिलाएं, मासिक धर्म से पीड़ित महिलाएं, बुजुर्ग इन सभी को रोजा नहीं रखने की छुट दी गई है , रमजान के महीने में सभी बुराईयों से तौबा कर के पुरे एक महीना रोजा रखना है कुरान पढ़ना नमाज़ पढ़ना रात में तरावी पढ़ना , जकात , खैरात देना वहीं ईद की नमाज से पहले फितरा का पैसा घर के हर फर्द ( प्रति व्यक्ति ) ढाई किलो गेहूं का दाम बाजार के दाम से गरीब मजबूर लाचार को देना होगा तभी ईद की नमाज होगी , जो खुद गरीब लाचार है उनको ज़रुरी नहीं है । लेकिन इन सब के बाद दिल ( आत्मा) का साफ होना जरूरी है नहीं तो सब बेकार ( निर्थक) है
