महुआ बिहार के कद्दावर पसमांदा नेता इरफान जामियावाला ने उठाई अतिपिछड़े पसमांदा मुसलमानों की आवाज़ — क्यों बड़ी पार्टियाँ करती रही हैं वर्षों से उपेक्षा?
बिहार की राजनीति में अति पिछड़ा (EBC) और पसमांदा मुसलमानों का सवाल सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों में से एक है। महुआ (वैशाली) के कद्दावर पसमांदा नेता और समाजसेवी इरफान जामियावाला ने बार-बार यह सवाल उठाया है कि आखिर क्यों हर बड़ी राजनीतिक पार्टी — चाहे कांग्रेस हो, राजद हो या भाजपा — पसमांदा मुसलमानों और अतिपिछड़ों को वर्षों से नज़रअंदाज़ करती रही है।
आज जब जाति-जनगणना, सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे बिहार की राजनीति के केंद्र में हैं, तब यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। अति पिछड़ा न्याय संकल्प और राजनीतिक सच्चाई
हाल ही में महागठबंधन ने “अति पिछड़ा न्याय संकल्प” नाम से दस्तावेज़ जारी किया। इसमें विशेष रूप से बिंदु 5 उल्लेखनीय है, जिसमें ईबीसी सूची में संशोधन के लिए एक कमिटी बनाने की बात कही गई है।
मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशें
बिहार में अति पिछड़ों के मामले में सबसे व्यापक रिपोर्ट मुंगेरी लाल आयोग की मानी जाती है।
इसमें सहकारी समिति, पिछड़ा वित्त निगम, नियामक संस्था, बैकलॉग, NFS (नॉन फार्म सेक्टर), भूमि वितरण — हर स्तर पर ठोस सुझाव दिए गए।
यहाँ तक कि प्रखंड स्तर पर भी अति पिछड़ा आयोग गठित करने की सिफारिश की गई थी।
दिलचस्प यह है कि आम धारणा के विपरीत मुंगेरी लाल आयोग ने संवैधानिक अड़चनों के चलते उपवर्गीकरण नहीं किया, जैसा कि मंडल आयोग ने भी नहीं किया था।
लेकिन 1951 से मौजूद अति पिछड़ों की सूची का वैज्ञानिक संशोधन जरूर किया।
उस सूची में मुसहर और थारू जैसे अत्यंत वंचित समुदाय भी शामिल थे। सूची में छेड़छाड़
दुर्भाग्य से बाद की सरकारों ने इस सूची के साथ खिलवाड़ किया।
कभी विकसित जातियों को इसमें डालकर, तो कभी वास्तविक अति पिछड़ों को हटा कर इस वर्ग का संतुलन बिगाड़ दिया गया।
आज भी 112 जातियों की सूची का न केवल पुनरीक्षण, बल्कि उपवर्गीकरण भी जरूरी है। संकल्प पत्र की खामियाँ
हालाँकि “अति पिछड़ा न्याय संकल्प” एक अच्छी पहल है, लेकिन इसमें कई गंभीर कमियाँ भी हैं:
उपवर्गीकरण का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
प्रतिनिधित्व और राजनीतिक हिस्सेदारी पर कोई ठोस आश्वासन नहीं।
दस्तावेज़ जारी करने के दौरान दर्शक दीर्घा से आवाज़ उठी कि अति पिछड़ों को 25% टिकट दिया जाए, लेकिन मंच से इस पर कोई वचनबद्धता नहीं आई।
वर्तमान प्रतिनिधित्व की स्थिति
बिहार विधानसभा और विधान परिषद में ऊँची जातियों और पिछड़े वर्गों का ओवर-रिप्रजेंटेशन है।
जबकि 36% ईबीसी की आबादी है, उनकी प्रतिनिधित्व संख्या आज भी single digit में है।
जाति-जनगणना के अनुसार सरकारी नौकरियों में उनका हिस्सा महज 22% है।
मंच पर मौजूद नेताओं में से केवल मुकेश सहनी ने ईबीसी/पसमांदा प्रतिनिधित्व की गारंटी की बात कही, बाक़ी नेताओं ने चुप्पी साध ली।
नीतीश कुमार और अति पिछड़े
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वर्षों से अति पिछड़ों के विधायिका में आरक्षण की मांग उठाते रहे हैं। लेकिन यह मांग ठोस नीतिगत बदलाव तक नहीं पहुँची। आज हालात यह हैं कि अति पिछड़े वर्ग — विशेषकर पसमांदा मुसलमान — राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर सबसे अधिक बेचैन हैं।
इरफान जामियावाला का सवाल
महुआ के पसमांदा नेता इरफान जामियावाला का कहना है:
हर बड़ी पार्टी पसमांदाओं को सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती रही है।
अनुच्छेद 341(3) की पाबंदी हटाकर दलित मुसलमानों को भी आरक्षण दिलाना जरूरी है।
यदि अति पिछड़े और पसमांदा मुसलमानों की हिस्सेदारी का सवाल सुलझा नहीं, तो सामाजिक न्याय अधूरा रहेगा।
बिहार की राजनीति में जो दल अति पिछड़ा–पसमांदा गणित को साध लेगा, वही भविष्य की सत्ता पर काबिज़ रहेगा।
निष्कर्ष
1. अति पिछड़ा न्याय संकल्प महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है, पर अधूरा है। 2. मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशें आज भी बिहार की अति पिछड़ा नीति के लिए मार्गदर्शक हो सकती हैं। 3. ईबीसी/पसमांदा मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व सबसे बड़ी चुनौती है। 4. यदि दल इस मुद्दे को अनदेखा करेंगे, तो यह संकल्प पत्र महज़ एक “झुनझुना” बनकर रह जाएगा। 5. इरफान जामियावाला जैसे नेताओं की आवाज़ आज इसीलिए और प्रासंगिक है क्योंकि वे उन तबकों की बात कर रहे हैं जिन्हें वर्षों से नज़रअंदाज़ किया गया है। इरफान जामियावाला आल इंडिया पसमान्दा मुस्लिम महाज़