महाराष्ट्र वक़्फ़ JPC मीटिंग और सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
महाराष्ट्र वक़्फ़ JPC मीटिंग और सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
मुंबई, महाराष्ट्र वक़्फ़ से जुड़ी संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की बैठक में ऑल इंडिया पासमांदा मुस्लिम महाज़ के राष्ट्रीय महासचिव और महाराष्ट्र प्रभारी इरफान जामियावाला ने तीन विवादित धाराओं पर कड़ा एतराज जताया था। उन्होंने चेताया था कि ये प्रावधान वक़्फ़ सम्पत्तियों को विवादों और गलत इस्तेमाल की ओर धकेल देंगे।
जामियावाला का कहना था कि: वक़्फ़ बोर्ड में एक विशेष पासमंदा बोर्ड हो क्योकि शियाँ बोर्ड में 90% अश्राफ् है और सुन्नी बोर्ड तो भरष्ट्राचारियों का अड्डा है,
पहला, “5 साल मुसलमान होने की शर्त” धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
दूसरा, Collector को यह अधिकार देना कि कौन-सी ज़मीन वक़्फ़ है या सरकारी, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ़ है।
तीसरा, वक़्फ़ बोर्डों और परिषदों में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बढ़ाना वक़्फ़ की धार्मिक पहचान को कमजोर करेगा।
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने 15 सितम्बर 2025 को इन्हीं तीनों प्रावधानों पर रोक (stay) लगा दी, वही मुद्दे जिनपर जामियावाला ने JPC मीटिंग में आपत्ति दर्ज कराई थी।
इरफान जामियावाला की बड़ी मांग
JPC की बैठक में इरफान जामियावाला ने यह भी कहा कि:
“वक़्फ़ की करोड़ों की ज़मीन और प्रॉपर्टी आज बड़े-बड़े मुस्लिम दबंगों और नेताओं के कब्ज़े में है।
यह ज़मीन अगर गरीब पासमांदा मुसलमानों को बाँटी जाए, तो उनकी ज़िंदगी बदल सकती है।”
उन्होंने प्रस्ताव रखा था कि गरीब परिवारों को आठ-आठ डिसमिल ज़मीन और छोटे दुकानदारों को एक-एक दुकान आवंटित की जाए, ताकि वक़्फ़ की संपत्ति का असली हक़दार समाज को लाभ मिले।
लेकिन अफसोस की बात यह रही कि सरकार और JPC समिति ने इस सुझाव को अब तक लागू नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोके गए प्रावधान
1. Section 3(1)(c): वक्फ़ बनाने के लिए 5 साल तक मुसलमान होने की शर्त – रोक।
2. Section 3C: Collector को वक्फ़ बनाम सरकारी संपत्ति का निर्णायक अधिकार – रोक।
3. Boards & Councils: वक्फ़ बोर्डों/परिषदों में गैर-मुस्लिम सदस्यों की अधिक संख्या – सीमा तय (4 से अधिक केंद्र में नहीं, 3 से अधिक राज्यों में नहीं)।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जामियावाला की आशंकाओं को सही साबित करता है। उन्होंने जो तीन मुद्दे JPC बैठक में उठाए थे, कोर्ट ने उन्हीं को असंवैधानिक मानते हुए रोका।
लेकिन असली सवाल यह है कि –
क्या वक़्फ़ की संपत्तियाँ बड़े मुस्लिम नेताओं और प्रभावशाली तबकों से निकालकर गरीब पासमांदा मुसलमानों को दी जाएँगी?
या फिर करोड़ों की ज़मीन पर कब्ज़ा जस का तस रहेगा?
