उर्दू का बहिष्कार और भारतीय मीडिया – इरफान जामियावाला का विरोध
78 का बहिष्कार और भारतीय मीडिया – इरफान जामियावाला का विरोध
मुंबई।
प्रसिद्ध पत्रकार, सोशल मीडिया लेखक और फिल्म–टीवी प्रोफेशनल इरफान जामियावाला ने भारतीय न्यूज़ मीडिया में उर्दू के बहिष्कार का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने कहा कि उर्दू सिर्फ़ मुसलमानों की भाषा नहीं, बल्कि भारत की साझा तहज़ीब, संस्कृति और आज़ादी की जद्दोजहद की पहचान है।
उर्दू बहिष्कार – संविधान का उल्लंघन
इरफान जामियावाला ने स्पष्ट कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 से 15 तक स्पष्ट रूप से भाषा, धर्म, जाति या क्षेत्र के आधार पर भेदभाव को असंवैधानिक ठहराया गया है।
अनुच्छेद 1 भारत को “राज्यों का संघ” और बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक राष्ट्र मानता है।
अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है।
अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, भाषा, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को मना करता है।
इसलिए, भारतीय मीडिया में उर्दू के प्रयोग को रोकना या इसे “विदेशी भाषा” बताना सीधा-सीधा संविधान का उल्लंघन है।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की कार्यवाही
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने हाल ही में TV9 भारतवर्ष, आजतक, ABP न्यूज़, ज़ी न्यूज़ और TV18 जैसे बड़े चैनलों को औपचारिक नोटिस भेजा है।
मंत्रालय का आरोप है कि ये चैनल, हिंदी चैनल होने के बावजूद, अपने प्रसारण में लगभग 30% उर्दू शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
मंत्रालय ने इन चैनलों से स्पष्टीकरण माँगा है और साथ ही भाषा विशेषज्ञों की नियुक्ति का निर्देश भी दिया है।
इरफान जामियावाला का तर्क
इरफान जामियावाला ने कहा कि –
हिंदी और उर्दू दोनों का मूल संस्कृत और प्राकृत से है, और दोनों भाषाएँ भारतीय ज़मीन की उपज हैं।
आम जनता की बोलचाल की हिंदी-हिंदुस्तानी में उर्दू का प्रयोग सहज और स्वाभाविक है।
न्यूज़ चैनलों में उर्दू को हटाना केवल भाषा पर हमला नहीं, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब पर हमला है।
उन्होंने चेतावनी दी कि उर्दू का बहिष्कार सिर्फ़ भाषाई नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय है और इससे भारत की लोकतांत्रिक विविधता को चोट पहुँचती है।
निष्कर्ष
इरफान जामियावाला ने मीडिया और सरकार से अपील की कि वे उर्दू के योगदान को सम्मान दें। उन्होंने कहा –
“उर्दू भारत की मिट्टी से निकली है, इसे पराया बताना न संविधान संगत है और न ही भारतीयता संगत। मीडिया का काम समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं।”
