May 2, 2026

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गया जामा मस्जिद के पूर्व इमाम व ख़तीब हज़रत मौलाना क़ारी महफ़ूज़ुर्रहमान का इंतक़ाल, हज़ारों अश्क़बार आँखों ने दी विदाई

गया जामा मस्जिद के पूर्व इमाम व ख़तीब हज़रत मौलाना क़ारी महफ़ूज़ुर्रहमान का इंतक़ाल, हज़ारों अश्क़बार आँखों ने दी विदाई

गया बिहार।सनोवर खान।

मगध कमिश्नरी के मशहूर व मक़बूल आलिमे-दीन, गया शहर की जामा मस्जिद के पूर्व इमाम व ख़तीब हज़रत मौलाना क़ारी महफ़ूज़ुर्रहमान साहब का लंबी बीमारी के बाद इंतक़ाल हो गया। इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन। उनके इंतेक़ाल की ख़बर से सिर्फ़ गया ही नहीं बल्कि पूरे बिहार और मुल्क के अलग-अलग हिस्सों में ग़म की लहर दौड़ गई।

नमाज़े जनाज़ा और शिरक़त करने वाले

मरहूम की नमाज़े जनाज़ा जामा मस्जिद गया के क़रीब अदा की गई, जिसमें हज़ारों की तादाद में लोग शामिल हुए। पटना, बिहार शरीफ़, दरभंगा, सीतामढ़ी, मधुबनी, दिल्ली और मुंबई समेत कई जगहों से उलमा, समाजसेवी और आम लोग पहुंचे।

पहली नमाज़े जनाज़ा पटना के क़ाज़ी वसी अहमद ने जामा मस्जिद के पास अदा कराई।

दूसरी नमाज़े जनाज़ा करीमगंज में मरहूम के बेटे हाफ़िज़ मसीहुर्रहमान ने अदा कराई।

जनाज़े में इमारते शरईया बिहार, उड़ीसा और झारखंड की नुमाइंदा टीम के साथ कई नामवर आलिम और शख़्सियतें मौजूद थीं, जिनमें मौलाना अहमद हुसैन मदनी, मौलाना नसीरुद्दीन (बेला गंज), हाफ़िज़ रफ़अत, मास्टर ओसैद (दरभंगा), पटना से बिहार मंथन एवं इंडिया खबर के वरिष्ठ पत्रकार हाजी मुख़्तार, अब्दुल हकीम उर्फ़ दादा बिहार मंथन के ब्यूरो चीफ क़ारी सुल्तान अख्तर और दीगर लोग ख़ास तौर पर शामिल हुए।

दीनी ख़िदमतें

मौलाना क़ारी महफ़ूज़ुर्रहमान साहब तक़रीबन 40 साल तक जामा मस्जिद गया के इमाम व ख़तीब की हैसियत से ख़िदमत अंजाम देते रहे। वे सिर्फ़ नमाज़ों और ख़ुत्बों तक सीमित नहीं रहे बल्कि रूहानी इलाज के ज़रिए भी बे-लौस उम्मत की सेवा करते थे। उनकी नर्मी, मेहमाननवाज़ी, ख़ुश मिज़ाजी और बुलंद अख़लाक की वजह से मगध इलाक़े के हज़ारों लोग उनसे जुड़े रहे।

उनका वतन ज़िला दरभंगा का बेलही गाँव था, लेकिन उन्होंने गया शहर (करीमगंज) में स्थायी निवास बना लिया था।

बीमारी और सब्र

पिछले चार महीने से बीमार थे, इसके बावजूद इस साल रमज़ानुल मुबारक में मुकम्मल तरावीह पढ़ाई और कहा था – “मुझे उम्मीद नहीं थी, मगर अल्लाह ने तौफ़ीक़ दी कि मैंने मुकम्मल तरावीह पढ़ाई।”
कुछ दिन पहले तबियत ज़्यादा बिगड़ने पर उन्हें स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन इलाज के बावजूद सेहत ठीक न हो सकी और वे ख़ालिक़-ए-हक़ीक़ी से जा मिले।

ज़ाती ज़िंदगी

मरहूम के पसमांदगान (परिवार) में अहलिया (पत्नी) और चार बेटे हैं। एक बेटे की शादी हो चुकी है जबकि तीन बेटे अविवाहित हैं। अल्लाह तआला परिवार को सब्र जलील अता करे।

तास्सुरात

हमारे नुमाइंदे के मुताबिक़, हज़रत मौलाना महफ़ूज़ुर्रहमान साहब निहायत शफ़ीक़ और रहनुमा शख़्सियत थे। वे कहा करते थे – “मैं अमरोहा से फ़ारिग़ हूँ। जामा मस्जिद गया की इमामत के लिए जब एलान हुआ तो कई उलमा उम्मीदवार थे, लेकिन मरकज़ निज़ामुद्दीन दिल्ली के बुज़ुर्गों की तस्दीक़ के बाद मेरी तक़रीरी हुई।”

मौलाना साहब बहुत सलीके से रहते, लोगों से प्यार और रहमत से पेश आते और मेहमाननवाज़ी उनका ख़ास शआ़र था। गया शहर में उनकी बहुत इज़्ज़त व औक़ात थी।

दुआ

अल्लाह तआला हज़रत क़ारी महफ़ूज़ुर्रहमान साहब अलैहिर्रहमा की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनके दर्ज़ात बुलंद करे और उनकी सभी ख़िदमतों को अपनी बारगाह में क़ुबूल फ़रमाए। आमीन या रब्बल आलमीन।

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