मॉरीशस में 2 नवंबर को अप्रवासी दिवस पर आयोजित हुआ समारोह
मॉरीशस में 2 नवंबर को अप्रवासी दिवस पर आयोजित हुआ समारोह
भारत-मॉरीशस मैत्री संघ के सचिव व सार्क जर्नलिस्ट फोरम बिहार के अध्यक्ष शशि भूषण कुमार ने भेजा अपना संदेश
“191 साल पहले 36 बिहारी मजदूर बनकर गए और बसा दिया पूरा सुनहरा देश मॉरीशस यह भारत के बिहारवंशियों के असाधारण मेहनत का ही परिणाम है” उक्त बात भारत-मॉरीशस मैत्री संघ के सचिव शशि भूषण कुमार ने भेजे गये अपने संदेश में कहा। अवसर था 2 नवंबर को अप्रवासी घाट पर अप्रवासी दिवस पर संस्थान के अध्यक्ष डॉ सरिता बुद्धू जी द्वारा आयोजित समारोह का। डॉ सरिता बुद्धू ने कहा 191 वर्षों पुरानी एक ऐतिहासिक कड़ी की याद दिलाता है, जब भारत से गिरमिटिया मजदूरों का पहला जत्था मॉरीशस पहुंचा था।हिंद महासागर में भारत के बिहार वंशियों का बसेरा है। मॉरीशस, हिंद महासागर में स्थित एक खूबसूरत द्वीप राष्ट्र है, जिसकी कुल आबादी 12 लाख से अधिक है. यहां 70% लोग भारतीय मूल के हैं। इस अवसर पर मॉरीशस प्रधानमंत्री पहुंच कर डॉ सरिता बुद्धू जी के अप्रवासी घाट पर उनके द्वारा आयोजित कार्यक्रम की भूरी भूरी प्रशांसा किया।
मॉरीशस की संस्कृति और भाषा में भारत के बिहार की झलक साफ देखी जा सकती है।भोजपुरी भाषा और हिंदू परंपराएं यहां के दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। मॉरीशस के पहले प्रधानमंत्री, सर शिवसागर रामगुलाम और हम सभी बिहार के भोजपुर जिले के वंशज थे।
ज्ञाताव्य है कि18वीं सदी में भारत में अकाल और भुखमरी के कारण लाखों लोगों की मौत हो गई थी. ब्रिटिश शासन ने इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए ‘गिरमिटिया प्रथा’ चलाई, जिसके तहत भारतीय मजदूरों को कर्ज के बदले मॉरीशस और अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों में भेजा गया। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें बेहतर रोजगार और जीवन की गारंटी का लालच दिया, लेकिन हकीकत कुछ और थी।
10 सितंबर 1834 को कोलकाता से 36 मजदूरों का पहला जत्था एटलस नामक जहाज से रवाना हुआ और 2 नवंबर 1834 को मॉरीशस पहुंचा. ये सभी मजदूर बिहार से थे और मॉरीशस में गन्ने के खेतों में काम करने के लिए लाए गए थे. धीरे-धीरे यह सिलसिला बढ़ता गया और 1834 से 1910 के बीच करीब 4.5 लाख भारतीय मॉरीशस पहुंचे।
जहां पहले भारतीय मजदूर मॉरीशस में उतरे थे, उसे आज ‘अप्रवासी घाट’ के नाम से जाना जाता है. यह स्थल मॉरीशस में भारतीय समुदाय के संघर्ष और योगदान का प्रतीक है. हर साल 2 नवंबर को ‘अप्रवासी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
ब्रिटिश शासन के तहत मजदूरों को 5 साल बाद भारत लौटने की अनुमति दी गई थी, लेकिन उन्हें वापस लौटने से रोका गया। 1860 में इस शर्त को ही समाप्त कर दिया गया और मजदूरों को अमानवीय स्थितियों में रखा गया। धीरे-धीरे भारत से आने वाले मजदूर यहीं बसते गए, और उनकी अगली पीढ़ियों ने मॉरीशस को ही अपना घर बना लिया। 1931 तक, मॉरीशस की 68% आबादी भारतीय मूल की थी।
भारत से आए गिरमिटिया मजदूरों में रामगुलाम परिवार भी शामिल था। मोहित रामगुलाम 1896 में बिहार से मॉरीशस आए। उनके पुत्र, शिवसागर रामगुलाम, इंग्लैंड में पढ़ाई करने के बाद मॉरीशस लौटे और स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया। 1968 में मॉरीशस आजाद हुआ और शिवसागर इसके पहले प्रधानमंत्री बने। उन्होंने देश में सामाजिक सुधार और मुफ्त शिक्षा जैसी योजनाएं लागू कीं।
